कुछ चीजें निहायत अनिवार्य होती हैं जिन्हें बहुत चाह कर भी टाला नहीं जा सकता. आदमी की जिंदगी की सीमा भी उन्हीं में से एक है. यह तो तंय है कि जिंदगी अनंत नहीं है और देर सबेर उसका अवसान होना ही है. यह उसका स्वभाव है. पर उसे जितना टाला जा सके हम टालने …
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हिंदी-लोक की ज्ञान सम्पदा की प्रासंगिकता
भाषा बाह्य जगत के अनुभव और अंतर्मन या मानस में उपस्थित हो रहे विचार दोनों से जुड़ी होती है. हमारे विचार बाहर की और आन्तरिक दुनिया दोनों से सम्बद्ध होते हैं. यद्यपि इनमें विद्यमान वस्तु और उस वस्तु का अनुभव दोनों भिन्न होते हैं और भाषा विचारों और प्रत्ययों ( कांसेप्ट) के माध्यम से उन …
सियाराम मय सब जग जानी
त्रेता के राम की कलियुग में बड़ी महिमा है । दयालु और दीनबंधु राम सबके लिए हितकारी हैं । वे दारुण भव भय को हर लेते हैं । सभी भक्तों ने राम-रसायन के सेवन से उद्धारका रास्ता दिखाया है । राम विष्णु के अवतार हैं और जगत के कल्याण के लिए अवतरित हुए थे । यह अवतार इस अर्थ में मनुष्य जाति के लिए विशिष्ट था कि मानव जीवन में किसीआम आदमी को अपने अनुभव में आने वाले छोटे बड़े हर तरह के उतार-चढ़ाव से भगवान राम को गुज़रना पड़ा और वे जीवन की सभी परीक्षाओं में खरे उतरते रहे । शरीर औरमन से उन्हें कभी विश्राम नहीं मिला और बाल्यावस्था से जो संघर्षमय जीवन का अभ्यास बना वह आजीवन बना रहा । आज उसी राम के व्याज से राजनीति और क़ानून के दाँवपेंचचल रहे हैं । शायद नए नए दंश झेलते रहना धनुर्धारी राम का स्वभाव सा है । राम इसलिए राम हैं कि वे हर अवस्था में अविचल रूप से मर्यादाओं को धारण करते हैं विशेष रूप से तब जब उनके अपनों पर दुःख आता है और सपनों पर पहरा लग जाता है। उनकी मुश्किलों की कोई सीमा नहीं । इक्ष्वाकु कुल में राजा दशरथ और माता कौशल्या के पुत्र रूप में जन्मे राम को बाल्यावस्था में ही खेल कूद छोड़ विश्वामित्र ऋषि के यज्ञकी रक्षा में लगना पड़ता है , युवा हुए तो सुनिश्चित राज्याभिषेक अचानक चौदह साल लम्बे वनवास में बदल जाता है, प्रिय पत्नी सीता को राक्षस उठा ले जाता है , राजा भी बने तोलाँछन लग जाता है और गर्भवती पत्नी को वन भेजना पड़ता है । राम को पग-पग पर आहत होने और दुःख झेलने के लिए तैयार रहना पड़ता है । इन सबसे गुज़र कर और नानाप्रकार के तापों में बार-बार तप कर हमारे राम ‘नीलाम्बुजश्यामल’ बनते हैं । जन नायक राम के लिए किसी तरह का अवकाश नहीं है । वे कोई छूट नहीं ले सकते चाहे जो हो जाए । सब कुछ के बावजूद वे कभी डिगते नहीं हैं । रघुकुल का यहस्वाभाविक रिवाज जो ठहरा कि वचन व्यर्थ नहीं जाना चाहिए चाहे उड़के लिए प्राण का भी उत्सर्ग क्यों न करना पड़े । उन्हें धर्म का “साक्षात विग्रह” कहा गया । भक्त-वत्सलराम को रिझाने के लिए केवल सहज प्रेम के भाव की ज़रूरत है । वे शबरी के बेर से भी संतुष्ट हो जाते है । ऐसे राम की आराधना से मनुष्य चित्त निर्मल होता है और धैर्य,सहनशीलता, सहयोग और परदुखकातरता के भावों का उदय होता है । राम सभी सद्गुणों के समुच्चय हैं । उन्होंने ऐश्वर्य का अतिक्रमण किया है ।आदि कवि वाल्मीकि जब काव्यरचना के लिए नायक खोजने चले तो कठिनाई में पड़ गए कि किसे लें और उनका समाधान राम के पावन चरित्र में मिला । राम को जन-जन ने अपनाया और वे श्वास- प्रश्वास मेंबस गाए और उनकी गाथा को हर भाषा में गाया गया ।राम लीला के माध्यम से राम चरित का दृश्यमान अनुभव लोक की स्मृति में बसता रहा । उत्तर , दक्षिण , पूर्व और पश्चिमसभी क्षेत्रों में राम कथा लोक प्रचलित है । आज भारत में मर्यादा पुरुषोत्तम राम को लेकर मर्यादा की तलाश हो रही है । अयोध्या को विवाद का केंद्र बना दिया गया है और वर्षों से राजनीति का खेल खेला जा रहा है । इसखेल के कई रूप हैं क्योंकि राजनीति की अब कोई मर्यादा नहीं रही । राम की और उनके मंदिर की ऐतिहासिकता के प्रमाण की तलाश हो रही है और दावों की कचहरी में जाँचसे निपटारा होगा । राम पर अपना अपना क़ब्ज़ा ज़माने के लिए कोशिशें जारी हैं ताकि उसकी सवारी पर राजनीति के समुद्र का संतरण हो सके प्रयास जारी हैं । गोस्वामीतुलसीदास के रामायण की कथा उत्तर कांड में सम्पन्न होती है पर नया – उत्तरोत्तर कांड रचा जा रहा है ।
गुरु की गरिमा स्थापित की जाय
गुरु की संस्था शिक्षा की औपचारिक व्यवस्था से पुरानी है। भारत में उसे सामाजिक जीवन का हिस्सा बना कर रखा गया । मनुष्य जीवन के पाँच ऋणों की व्यवस्था में ‘गुरु ऋण’भी शामिल है । अर्थात समाज गुरु के प्रति श्रद्धा रखता था और मार्ग दर्शन के लिए उसके प्रति ऋणी अनुभव करता था। गुरु कि परंपरा …
मंजिल अभी दूर है
नारी और स्त्री के उत्पीड़न और शोषण की कथा पुरानी है। तरह-तरह के औपचारिक, अनौपचारिक, शास्त्रीय और लौकिक व्यवस्थाओं के जरिये पुरुष की प्रताड़ना सदियों से चली आ रही है। इक्कीसवीं सदी में भी उनकी कराह और घुटन बरकरार है। छिटफुट बदलाव जरूर आया है और कुछ स्त्रियाँ ज्ञान, विज्ञान, खेल, कला, कौशल के क्षेत्रों में आगे आ रही हैं। यही …
नैतिकता की राह में जरूरी है अहं से छुटकारा
हमारी निहायत व्यक्ति केंद्रित होती जा रही संस्कृति सिर्फ अहं भाव को संतुष्ट और प्रदीप्त कर रही है. वह हमारे आध्यात्मिक स्वभाव यानी आत्मा को दबाती जा रही है. आम तौर पर पढाई पूरी करने के बाद, नौकरी, शादी व्याह, परिवार, धन सम्पत्ति का अर्जन करते हुए लोग उस शिखर को छू लेते हैं जिसकी उन्हें चाह थी. वे उद्योगपति, नेता, अभिनेता, डाक्टर, इंजीनियर …
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मीडिया की सत्ता और स्वायत्तता
जानकारी, सूचना और ज्ञान की भूख किसी न किसी रूप में हर समाज में चिर काल से ही रही है और उसको पहुंचाने के उपाय किए जाते रहे हैं. परंतु आज जिस तरह एक निर्णायक संस्था के रूप में मीडिया छाता जा रहा है वह विलक्षण घटना है. उसकी उपस्थिति असरदार हो रही है. मीडिया की …
प्रकृति का कोई विकल्प नहीं है
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सारी दुनिया में मार्च में जल दिवस, अप्रैल में पृथ्वी दिवस , मई में जैव विविधता दिवस और जून में पर्यावरण दिवस मनाया गया. जागरूक मीडिया द्वारा इन सभी अवसरों पर घोर चिंता प्रकट की गई. जनता को यथासंभव सचेत करने की कोशिश भी की गई. यह निरा संयोग नहीं है कि इन सब चेतना-सम्बर्धन के प्रयासों के केंद्र में …
देशी भाषाओं का अनादर राष्ट्रीय हानि है
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी मानते थे कि ‘अपने देश की सभी भाषाओं की उन्नति होनी चाहिए पर हिंदी सभी को आनी चाहिए . हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही होनी चाहिए ’. वे भारत की सभी भाषाओं की उन्नति चाहते थे पर हिंदी का प्रसार या फैलाव अत्यंत व्यापक है इसकी अनदेखी भी नहीं चाहते थे . गाधी जी …
एक सौम्य, प्रखर नेतृत्व और निष्ठावान हिंदी सेवी की कमी हमेशा खलेगी
लोक सभा में कश्मीर को लेकर ऐतिहासिक फैसले को जान कर सुषमा जी को प्रसन्नता कि देर ही सही एक पुरानी भूल को सुधारा गया और देश की मुख्य धारा में कश्मीर को शामिल किया गया . उन्ह्ने यह भी लगा कि नकारात्मक माहौल ख्त्म होगा और उस क्षेत्र के विकास और उन्नति के मार्ग …
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