समकालीन जीवन और भगवान महावीर की जीवन दृष्टि

 अपनी भौतिक सीमाओं को स्पर्श करती आज की दुनिया में संयम और संतोष जैसे विचार बेहद जरूरी होते हुए भी हमारे मन में अपनी जगह नहीं बना पा रहे हैं. पर दो तीन हजार साल पहले जब साधन और सुविधाओं का अकाल न था भारत में जैन और बौद्ध दर्शन सीमाओं को पहचान कर जीने …

संत विनोबा का मर्म

निष्काम कर्मयोगियों में अग्रणी विनोबा जी अपने जीवन में ज्ञान और कर्म  को साधने तथा उनके बीच उत्पादक सामंजस्य बैठाने की सतत कोशिश करते रहे  । ईश्वर -प्रणिधान और आध्यात्मिक जीवन को अपने निजी अनुभव में लाते हए विनोबा जी ने साधु – जीवन जिया  और समत्व योग में अवस्थित रहे । उनके कर्म अकर्म …

संस्कृति की सत्ता

‘संस्कृति’ एक  बड़ा व्यापक शब्द या अवधारणा है जिसे अनेक अर्थों में ग्रहण किया जाता है. समूह के स्तर पर वह साझी मानवीय उद्यम की उपलब्धि है. शरीर संरचना में समानता होने पर भी विभिन्न समूहों या समुदायों की संस्कृतियों में भौतिक और अभौतिक दोनों ही दृष्टियों से विविध रूप होते हैं  जो उस समूह विशेष को …

जीवित अतीत है संस्कृत

 देव-भाषा या सुर-भारती कह कर संस्कृत भाषा को प्रायः पूजा-पाठ की वस्तु मान कर हम लोग कथा-वार्ता,  देवार्चन और संस्कार जैसे प्रयोजनों पर यदा-कदा याद कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। अवसर के अनुसार कुछ कृत्य भी पूरे कर लिए जाते हैं परंतु वास्तविक जीवन के लिए उसे उपयुक्त नहीं माना जाता और …

पत्रकारिता का बदलता परिदृश्य

परम्परा के हिसाब से पत्रकारिता मूलतः समाचार और अपने परिवेश की चेतना से जुड़ी हुई है. समाचार अर्थात दुनिया में जो कुछ घट रहा है उसका विवरण नागरिक धर्म निभाने के लिए जरूरी था. अखबार इस तरह का बयान तैयार कर आम जन तक पहुँचाने का माध्यम होता है. साथ ही पत्रकारिता लोकतांत्रिक मूल्यों का …

उपभोग , पर्यावरण और हमारा भविष्य

 परिपक्व और सयाना होना आदमी को श्रेष्ठ बनने की दिशा में आगे ले जाता है. निजी व्यक्तिगत जीवन में विकास का यह चरण जीवन को गुणवत्ता की दृष्टि से समृद्ध करने वाला चरण होना चाहिए क्योंकि न चाहने पर भी हमारी उपस्थिति का आशय सिर्फ वर्तमान तक ही सीमित नहीं रह पाता. मनुष्य जीवन का …

योग ही जीवन है

असीम सी लगती भौतिक प्रगति के सहारे आज का मनुष्य अपनी प्रत्येक सीमा को झुठलाने की कोशिश में लगा है. तकनीकी क्रांति उसे देश और काल दोनों के साथ खेलने के तमाम उपकरण भी मुहैया करा रही है. इन सब के बावजूद आज हर कोई अनिश्चय, असंतुष्टि और अज्ञात भय से बेचैन, बदहवास और बदहाल …

गणतंत्र, राष्ट्रीय भावना और सामाजिक कल्याण

 प्राचीन षोडश जनपदों से परिचित होने और गावों में पंचायत की व्यवस्था के बावजूद स्वतंत्र भारत के लिए आधुनिक गणतंत्र की राह चुनना सरल नहीं था. भाषा, धर्म, जाति, क्षेत्र, वेश-भूषा आदि की बहु आयामी विविधता के मद्दे नजर  एक ऐसा शासकीय विधान तैयार करना जो सबके हितों को सम्बोधित कर सके एक बड़ी चुनौती थी और उसका निर्माण …

मातृभाषा की उपेक्षा कब तक !

मातृभाषा के माध्यम से ही मनुष्य का  ज्ञान- विज्ञान की दुनिया में पदार्पण होता है ।  माँ के स्तनपान के साथ साथ अबोध शिशु जिन ध्वनियों  और दुनियावी  वस्तुओं से परिचना शुरू करता है वहबच्चे को प्रतीकों की नई दुनिया में प्रवेश दिलाता है । यह प्रक्रिया बड़ी सरल और प्रभावी होती है क्योंकि बच्चे के आसपास गुंजरित होते परिवेश में देखते सुनते  इस भाषा में निरंतर अभ्यासचलता रहता है । ऐसे में भाषा की दुनिया का एक सुदृढ़ आधार तैयार होता है जो सहज और स्वाभाविक होने के कारण सरल और सुग्राह्य होता है । धीरे-धीरे बच्चा ध्वनि , शब्द और अर्थ केप्रयोग में दक्षता प्राप्त करने लगता है । इस तरह भाषा बच्चे के लिए एक नया उपकरण बन जाता है जो उसके लिए एक समानांतर दुनिया ही खड़ा  करता  है । चूँकि मातृभाषा का  उपकरणअनायास मिल जाता है उसकी क्षमता किसी अन्य भाषा से निर्विवाद रूप से अधिक होती है । फलतः मातृभाषा का उपयोग करते हुए बच्चे की  बौद्धिक प्रगति किसी दूसरी आरोपित भाषा कीअपेक्षा अधिक तीव्र होती है । साथ ही मातृभाषा के साथ बच्चा अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक दुनिया भी बनाता और बसाता है । एक बार मातृभाषा पर पकड़ आ जाने पर भाषा का स्वभाव समझमें आ जाता है और तब अन्य भाषाओं को भी अर्जित करना सरल हो जाता है ।  भारत की भाषाई स्थिति अद्भुत है । यहाँ  ऐतिहासिक कारणों विशेषता: औपनिवेशिक परिस्थितियों से उपजे मानसिक अवरोधों के कारण भाषा का नियोजन अंग्रेज़ी और अंग्रेजियत से इसक़दर आच्छादित हो गया कि स्वतंत्रता मिलने के सत्तर साल बीतने पर भी हम किंकर्तव्यविमूढ बने बैठे हैं और कोई कारगर भाषाई नीति विकसित नहीं हो सकी हैं।विकास की सारी कहानी चलरही है परंतु शिक्षा और भाषा जैसे सवाल पृष्ठभूमि में चले गए हैं जब कि दीर्घ काल तक इनकी उपेक्षा बड़ी घातक होगी ।   आज की हक़ीक़त यह है कि अंग्रेज़ी की  भाषाई सेंधमारी ( या डकैती !) से सभी ढेर होते दिख रहे हैं । सरकार तो सरकार ही ठहरी उसे  इस तरह के आधारभूत प्रश्नों से उलझने और निपटनेकी न फ़ुर्सत है न साहस ।  आज काफ़ी बड़ी संख्या में हम भारतीयों ने आधुनिक सभ्यता और ज्ञान के लिए अंग्रेज़ी को अनिवार्य मान लिया है ।  आम आदमी यह मान बैठा दिखता  है कि अंग्रेज़ी में महारत हासिल होते हीसफ़कता चरण चूमेगी । इस ऊहापोह  में बंगाल हो या उत्तर प्रदेश अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालयों की पौ बारह है । वे मनमानी फ़ीस भी लेते हैं और भारत में अंग्रेज़ी के मानस – द्वीप का निर्माण भीकरते हैं । बच्चा कहता है “मम्मी मेरे लेफ़्ट लेग की फ़िंगर में चोट लगी है “ और इस भाषाई उपलब्धि से माताश्री  भी धन्य हो गौरवान्वित अनुभव करती हैं । विद्यालय में अंग्रेज़ी प्रयोग ज़रूरी औरहिंदी प्रयोग दंडनीय घोषित कर दिया जाता है  । इसका परिणाम भाषा-प्रदूषण के रूप में भी दिख रहा है जिसके चलते भाषा में अंग्रेज़ी घुसपैठ ‘हिंगलिश’ को जन्म दे रही है और हिंदी केस्वभाव और सौष्ठव को नष्ट कर रही है ।  अस्वाभाविक होने पर भी अंग्रेज़ी का हौवा कुछ विलक्षण रूप से सबके दिमाग़ पर छाया हुआ है । भारत की भाषायें अंग्रेज़ी के आगे लाचार और जनहित दिखती हैं । बहुतों को हिंदी या अन्यभारतीय भाषा के प्रयोग में दीनताऔर  हीनता अनुभव होती है । आख़िर अंग्रेज़ी अंग्रेज़ी जो  ठहरी ! उसने हम पर राज किया इसलिए राजा की तरह बनना है तो अंग्रेज़ी से  हो कर ही उसकारास्ता आगे जाता है । यह असर मन में इतना गहरा पैठ चुका  है  कि मुद्रित और दृश्य हिंदी संचार माध्यम या मीडिया में भी अंग्रेज़ी की छौंक और बघार लगाए बिना मन नहीं मानता । अंग्रेज़ी मेंही ‘मास्टर स्ट्रोक’ जैसा तगड़ा जुमला शेष है । 

आज के दौर में कबीर की प्रासंगिकता

 भारतीय समाज की विविधताओं और बहुलताओं को लेकर जो आकलन किए जाते हैं वे अक्सर किसी न किसी आग्रह से प्रेरित होने के चलते बहुतों को ग्राह्य नहीं होते. आज के युग में बहुमत और अल्पमत आदि की कोटियों में खड़े हो कर देखते हुए समाधान खोजना तो दूर समस्या की पहचान ही मुश्किल होती …

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