चक्रव्यूह में शिक्षा : निकालें कैंसे ?

नई शिक्षा नीति बड़े उत्साह के साथ सरकार की नई पारी के शुरू होते ही पेश की गई । उसके मसौदे में 0-3 वर्ष से आरम्भ कर जीवनपर्यंत शिक्षा मुहैया कराने का एक महत्वाकांक्षी खाका रखा गया है। इसके अंतर्गत सुधार के लिए सुझाव  भी मांगे गए हैं परंतु  इसे लागू करने के लिए पर्याप्त संसाधन के …

देश की नियति के लिए जरूरी है ईमानदार नीयत

राजनीति एक सतत प्रवाह है जिसके अंतर्गत पहले जो कुछ हो चुका है उससे वर्तमान अछूता नहीं रह्ता और भविष्य की रचना में बीते अतीत को लेकर आधार सूत्रों की खोज की जाती है. आज आम चुनाव के मौके पर कांग्रेस और शेष गैर कांग्रेस दलों के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय खेमों में सत्ता की जोड़तोड़ में …

भारत के लिए बने शिक्षा नीति

भारत सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति-19 का बहुप्रतीक्षित मसौदा इक्कीसवीं सदी के लिए ‘भारतकेंद्रित’ और ‘जीवंत ज्ञान समाज’ के निर्माण के दो महत्वपूर्ण संकल्पों के साथ  विचारार्थ जारी किया गया है. साथ ही यह एक समावेशी दृष्टि अपनाते हुए भारत के भविष्य की रचना के लिए भी प्रतिश्रुत है. जहां एक ओर मनुष्य के विकास में शिक्षा कि भूमिका …

विश्वविद्यालयों में शोध की स्थिति

अगस्त २०१९ में “न्यूज़ टाइम्स पोस्ट” पत्रिका में प्रकाशित साक्षात्कार – 1.माना जाता है कि उच्च शिक्षा में रिसर्च या शोध की भूमिका सबसे अहम होती है। इस मापदण्ड के आधार में भारत में शोध की क्या स्थिति है? आज की दुनिया में उच्च शिक्षा के लिए शोधकार्य प्राणनाड़ी सरीखा होता है .  भारत में …

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए संकल्प और संसाधन दोनों चाहिए

नई शिक्षा नीति के तहत भारत को केन्द्र में रख कर शिक्षा पर विचार करना उन सभी लोगों के लिए सुखद है जो उसके विस्मरण, उपेक्षा, और भ्रामक या अवांछित प्रस्तुति से खिन्न रहा करते थे. ऐसे ही ‘ज्ञान (केंद्रित!) समाज’ का विचार भी भारतीयों के लिए हर्षजनक है जो ज्ञान को पवित्र और क्लेश को दूर कर मुक्ति देनेवाला मानते …

शिक्षा और परीक्षा का सामाजिक यथार्थ

 इस बार विभिन्न बोर्ड-परीक्षाओं के परिणाम इस अर्थ में बड़े ही संतोषदायी रहे कि काफी संख्या में छात्र-छात्राओं कोपरीक्षा में अप्रत्याशित ढंग से अत्यंत ऊंचे अंक मिले हैं . कुछ तो पूर्णांक को बस छूते-छूते रह गए . इन प्रतिभाओं का हार्दिक अभिनंदन . हमारी शुभकामना है कि ये जीवन में यशस्वी बनें. इन बच्चों …

स्वतंत्रता है अपने को परिभाषित करने की बेला

मनुष्य भी अपने किस्म का एक अकेला प्राणी है जो स्वयं को परिभाषित करता है। इस सृष्टि में सभी जीवों में वही एक आत्मपरिभाषी (सेल्फ डिफ़ाइनिंग) जीव  है। वह खुद तय करता है कि वह क्या है और क्या हो सकता है। इसके लिए प्रकृति द्वारा उसे छूट भी मिली है और साधन भी उपलब्ध …

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