अभिव्यक्ति का व्याकरण

चूंकि हमारे व्यक्तित्व की रचना व्यक्त और अव्यक्त भागों से मिल कर पूर्ण होती है इसलिए व्यक्त या अभिव्यक्त अकेले ही समस्त को नहीं बता पाता . परदुनिया में जो अभिव्यक्त है उसी का बोलबाला रहता है. अभिव्यक्ति का महत्त्व इसलिए भी है कि जो व्यक्त है वह प्रकट हो कर न केवल दूसरों तक …

मूल्य की सत्ता

धरती पर मनुष्य ही अकेला जीव है जिसके लिये उसकी  शारीरिक और  भौतिक जीवन नाकाफ़ी या अपर्याप्त होता है क्योंकि वह अपनी बुद्धि के बल पर इसके पार भी झांक पाता है । उसकी रची संस्कृति उसकी उपस्थिति को निरंतरता देते हैं । मनुष्य स्वयं अपने को रचता है और उसकी सर्जना एक बडा हस्तक्षेप …

सृष्टि के साथ जीने की चुनौती

हमारे पर्यावरण की स्थिति कितनी बिगड़ती जा रही है यह बात किसी से छिपी नहीं है. अक्सर हम उसमें काट छांट कर हम अपने सुख के लिए जगह बना लेते हैं, बिना यह सोचे के हमारे हस्तक्षेप का क्या परिणाम होगा. पर जब प्रकृति का सन्तुलन बिगड़ता है तो ऐसे-ऐसे हादसे होते हैं जिनका फल …

भारतीय मानस और शिक्षा की संभावनाएं

                 प्रश्नपरक जिज्ञासु भारतीय मानस चिन्तन-मनन से बडी गहराई से जुडा रहा है । सृष्टि और उससे परे ‘उसे’ जानने की तीव्र इच्छा – ‘ तत विजिज्ञासस्व ’ , उसके जीवन यात्रा के लिये प्रमुख प्रस्थान विन्दु रही है। उस सर्वव्यापी सत्य या ईश्वर की उपस्थिति को  हर जगह देखना उसके सहज स्वभाव में था …

समकालीन जीवन और संयम

आज जब ‘समकालीनता ‘ स्वयं में एक अवधारणा का रूप ले चुकी है और उसके रंग में रंगा जाना मूल्यवान माना जा रहा है समकालीनता के प्रसंग में महात्मा गांधी पर विचार करना  कोई महत्व नहीं रखता. समकालीनता में सब कुछ ‘इंस्टैंट’ होना चाहिए और इस तर्क से सब कुछ दूसरे ही क्षण पुराना पड़ता …

विचारों में भी स्वराज चाहिए

    यह सिर्फ संयोग की बात नहीं है कि अंग्रेजी राज के दौर में जिस समय 1929 में लाहौर में कांग्रेस द्वारा ‘पूर्ण स्वराज्य’  का प्रस्ताव पारित किया जा रहा था उसी समय कलकत्ता में हुगली कालेज में प्रसिद्ध  दार्शनिक प्रोफेसर कृष्ण चंद्र भट्टाचार्य भारत में “विचारों में स्वराज” लाने की जरूरत का प्रतिपादन कर …

संस्कृति के संदर्भ में हिंदी का उद्विकास

 चूँकि भाषा स्वभाव से ही अनिवार्य रूप से एक सामाजिक उत्पाद है इसलिए भौगोलिक और सांस्कृतिक परिवेश में परिवर्तन के समानांतर भाषा के रूप भी बदलते जाते हैं। प्रत्येक भाषा अनिवार्यतया संस्कृति में ही पलती-बढ़ती है और सामाजिक संवाद और संचार के उपक्रम में ही उसका जन्म और विकास होता है। इसके साथ ही यह …

निश्शब्द–नूपुर

    मौलाना जलालुद्दीन रूमी की १०० ग़ज़लों का मूल फ़ारसी से हिन्दी अनुवाद  ‘निःशब्द–नूपुर’ का प्रकाशन एक स्वागत योग्य घटना है। इस संकलन का प्रकाशन ईरान सरकार के आर्थिक सहयोग से महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा तथा राजकमल प्रकाशन, दिल्ली के संयुक्त तत्त्वावधान में किया गया है। इस पुस्तक की बड़ी विशेषता यह है …

संगीत है शब्दयोग की साधना और आरोग्य का आधार

अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्वं यदक्षरं विवर्तते Sर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यत: -भर्तृहरि(वाक्यपदीय) (आदि और अंत से रहित जो अविनाशी ब्रह्म है , उसका स्वरूप शब्द है. वही जागतिक पदार्थों के रूप में अपने आप को  परिवर्तित कर लेता है जिसके नाते संसार की प्रक्रिया चल  पाती है)  शब्द नित्य है !. शब्द परब्रह्म है!!. समस्त सृष्टि ध्वनि …

Exclusive Interview of Professor Girishwar Misra

Psychologus, 2019, 1 (7), 90-97 ( WWW.PSYCHOLOGUS.COM) What was the topic of your Doctorate? It was “Psychological Consequences of Prolonged Deprivation.” Who has been your role model(s) in your student life? Why? During my academic career spanning over four decades a number of seniors and Gurus (teachers) had influenced my academic journey. I owe a …

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