Be yourself; Everyone else is already taken.
— Oscar Wilde.
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चूंकि हमारे व्यक्तित्व की रचना व्यक्त और अव्यक्त भागों से मिल कर पूर्ण होती है इसलिए व्यक्त या अभिव्यक्त अकेले ही समस्त को नहीं बता पाता . परदुनिया में जो अभिव्यक्त है उसी का बोलबाला रहता है. अभिव्यक्ति का महत्त्व इसलिए भी है कि जो व्यक्त है वह प्रकट हो कर न केवल दूसरों तक पहुंचता है बल्कि दूसरे उसी के आधार पर हमारे मंतव्य और आशय को ग्रहण करते और समझते हैं. ऐसे में अभिव्यक्ति सार्वजनिक ज्ञान का महत्वपूर्ण माध्यम हो जाता है. हम मौखिक और लिखित रूपों वाले वाचिक और विविध प्रकार के अवाचिक संचार (जैसे- हाव-भाव, भंगिमा, इंगित) आदि के द्वारा दूसरों तक अपनी बात पहुंचाते हैं. शायद यह कहना अत्युक्ति न होगी कि ये संचार ही सार्वजनिक जीवन के सिक्के हैं जिनकी सहायता से हम सबका जीवन व्यापार चलता है. आज हर कोई अभिव्यक्ति को प्रभावपूर्ण बनाने की कोशिश में लगा रहता है. अभिव्यक्ति द्वारा अनेक प्रयोजन सिद्ध होते हैं और इसमें महारत हासिल करना शायद व्यक्ति या किसी समुदाय की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है और अभिव्यक्ति का अवसर न मिल पाना सबसे बड़ा दंड बन जाता है.
अभिव्यक्ति द्वारा हम एक दूसरे के साथ जुड़ते हैं और लक्ष्यों को पाने के लिए संयुक्त रूप से विभिन्न योजनाओं पर जुट कर कार्य करते हैं. आज बिना अभिव्यक्ति के किसी का काम पूरा नही होता है. यह अवश्य है कि अभिव्यक्ति ज्यों की त्यों हो सकती है या कुछ परोक्ष या फिर कुछ बिगड़ी हुई या विरूपित. हमारी अभिव्यक्ति अभिधा, लक्षणा और व्यंजना की शैलियों मेंसे किसी में भी हो सकती है. वस्तुतः हमने अभिव्यक्ति की अनेक शैलियाँ विकसित कर ली हैं. रूपक, उत्प्रेक्षा, श्लेष, अन्योक्ति, उपमा आदि काव्य रचना में प्रयुक्त अलंकार अभिव्यक्ति की शैली को ही बताते हैं. क्या कहा जाता है इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वह कैसे कहा जाता है.
संचार में प्रतीकों की बड़ी भूमिका होती है क्योंकि हम अपनी अभिव्यक्ति प्रतीक या कोड के ही माध्यम से करते हैं. फिर सुनने या ग्रहण करने वाले के द्वारा प्रतीकों को डीकोड भी किया जाता है. इन दोनों कामों के लिए व्याकरण जैसे नियमों की जरूरत पड़ती है. वस्तुतः दूसरों द्वारा किसी की के कहे की स्वीकृति उस कथन की विषय-वस्तु और कथन के तरीके दोनों पर ही निर्भर करती है. अभिव्यक्ति के कुछ तरीके और सन्देश जहां सहज स्वीकार्य होते हैं वहीं कुछ दूसरे न केवल अग्राह्य हो जाते हैं बल्कि विद्वेष के सबब भी बन जाते हैं. इस तरह अभिव्यक्ति के खतरे भी हैं क्योंकि वह किसी को आघात पहुंचा सकती है और तब उसका लक्ष्य व्यक्ति या समुदाय विरोध और प्रतिरोध करता है. तब अभिव्यक्ति हिंसात्मक रूप भी ले लेती है.
वस्तुतः संस्कृति का सृजनात्मक पक्ष अभिव्यक्ति का उत्सव हुआ करता है. विभिन्न माध्यमों से अभिव्यक्ति के वैविध्य का सभ्य समाज द्वारा स्वागत और अभिनन्दन किया जाता है. अभिव्यक्ति की भिन्नता और प्रखरता ही कलाकार की उपलब्धि बन जाती है. उसी से उसको प्रतिष्ठा मिलती है. कला जगत के विभिन्न सम्प्रदाय अभिव्यक्ति-शैलियों को रूढ़ बना देते हैं. प्राचीन काल में साहित्य में गौड़ी, वैदर्भी और पांचाली अभिव्यक्ति की प्रमुख शैलियों के रूप में प्रचलित थीं. ये शैलियां एक तरह से अभिव्यक्ति के व्याकरण का निर्माण करती थीं. इसी तरह ओडिसी, भारत नाट्यम, भांगड़ा या कुचिपुड़ी नृत्य की अलग-अलग शैलियाँ है. इन सबमें रूप विधान, भंगिमा, कथानक और प्रस्तुति की दृष्टि से विविधता मिलती है.
कहना न होगा कि मानवीय अभिव्यक्ति का क्षेत्र बड़ा ही व्यापक है. मानवीय सर्जना के क्षेत्र में अभिव्यक्ति का महत्त्व किसी से छिपा नहीं है. चाहे नृत्य, वाद्य संगीत, कंठ संगीत जैसी प्रदर्शनकारी कला हो या फिर चित्र कला, पुतुल निर्माण आदि जैसी रूपंकर कलाएं हों सबमें अभिव्यक्ति की ही प्रधानता है. काव्य, उपन्यास, निबंध, नाटक, संस्मरण आदि विविध रूपों में हमारे सम्मुख प्रस्तुत साहित्य जगत का तो कहना ही क्या वह पूरी तरह से अभिव्यक्ति का ही विलास होता है. अभिव्यक्ति की श्रेष्ठता ही है कि तुलसी, सूर, कबीर, रहीम और मीरा जैसों की काव्य-पंक्तियाँ लोग सदियों से गुनगुनाते आ रहे हैं. अर्थात सृजन में जो कुछ हमारे सम्मुख उपस्थित होता है वह अभिव्यक्ति का ही प्रसाद होता है. फिल्मों का उल्लेख किए बिना अभिव्यक्ति की चर्चा अधूरी ही रहेगी. फ़िल्में अभिव्यक्ति के शास्त्र और तकनीक की निपुणता पर ही बाक्स आफिस पर हित होती हैं. उनमें स्थापित होने वाली शैलियाँ जन जीवन के पसंद और फैशन को प्रभावित करती है. फिल्म सेंसर बोर्ड अभिव्यक्ति की परिधि को उसके सामाजिक सांस्कृतिक प्रभाव को ध्यान में रख कर तय करता है.
अभिव्यक्ति कैसे और किस रूप में हो इसके लिए कुछ नियम बनाए जाते हैं और उन्हें स्वीकार कर लागू भी किया जाता है. नियमों की स्वीकृति और उपयोग से अभिव्यक्ति के आशय या तात्पर्य का सहज-बोध होने में सुभीता होता है. पर ये नियम भी सृजनात्मकता की शक्ति के आगे हेठे पड़ जाते हैं संस्कृति की सत्ता अपने अभिव्यक्त रूप में ही प्रमाणित होती है. मानवीय अभिव्यक्ति ने अब तक कई रूप धरे हैं. वह क्रमशः मौखिक, लिखित, मुद्रित और अब साइबर युग में डिजिटल रूप में उपस्थित हो रही है. उसकी व्यापकता ने अप्रत्याशित रूप से तीव्र गति पकड़ी है. इस बदलते परिप्रेक्ष्य में साइबर अपराध भी हो रहे हैं जो मूलतः अभिव्यक्ति की होड़ और ग्राहक के मन पर अधिकार को ध्यान में रख कर होते है. विकी लीक तथा पनामा लीक जैसी घटनाओं के प्रभाव भी अभिव्यक्ति के आयाम को ही व्यक्त करते हैं.
उल्लेखनीय है कि अभिव्यक्ति का अवसर सबको समान रूप से नहीं मिल पाता. चूंकि सामाजिक जीवन में अपनी महत्ता के कारण अभिव्यक्ति एक बड़ा ही मूल्यवान संसाधन है अतः इसके अवसर पर नियंत्रण लगा रहता है और विभिन्न सामाजिक वर्गों के लोगों को इसका अवसर भिन्न-भिन्न मात्रा में ही मिल पाता है. वह सबको समान मात्रा में नहीं मिल पाता है और प्रतिष्ठा, शक्ति और राजनैतिक सत्ता का नियामक आधार बन जाता है. जो प्रभुता से युक्त होते हैं वे इस पर अपना अधिकार जमा लेते हैं और जो शासित होते हैं वे इससे वंचित रह जाते हैं. अधिकाँश देशों में राजतंत्र के शासन के दौरान जनता पर नियंत्रण करने के लिए अभिव्यक्ति पर पहरा लगा रहता था और निरंकुश राजा द्वारा इसका दमन के शस्त्र के रूप में उपयोग किया जाता था. भारतीय इतिहास इसका साक्षी है कि अंग्रेजों के शासन काल में भारतीयों को अभिव्यक्ति के सीमित अवसर मिलते थे. भारतीयों द्वारा उनके दमन का विरोध करने पर सजा मिलती थी. महात्मा गांधी का सत्याग्रह, प्रसिद्ध दांडी मार्च, असहयोग आन्दोलन, उनके द्वारा अखबारों का प्रकाशन एक व्यापक अर्थ में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ही व्यक्त करते हैं. वे अंग्रेजी शासन में हो रहे विभिन्न प्रकार के अत्याचारों को प्रकट करते हैं.
अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मनुष्य के अधिकार के रूप में ग्रहण की जाती है . इसे संविधान में मूल अधिकार में परिगणित किया गया . बोलने, लिखने, घूमने, अपना विचार रखने, छापने की स्वतंत्रता सबके लिए मुहैया कराई गई. सार्वजनिक स्थानों पर अपनी बात कहने की छूट दी गई. अखबारों को मत प्रकाशित करने और संवाद को आगे बढाने की व्यवस्था की गई. संचार के विभिन्न माध्यम हमें अभिव्यक्ति का अवसर देते हैं. आज भारत में लगभग सभी भाषाओं में अखबार प्रकाशित हो रहें पत्रिकाओं, पुस्तकों का भी प्रकाशन बड़ी तेजी से बढा है. यह सब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यंजित करता है.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अनेक लोगों द्वारा दुरुपयोग भी किया जाता है. कई लोग अपने स्वार्थ साधन के लिए विरोध करने के क्रम में अनेक आरोप लगाए जाते हैं जो निराधार भी होते हैं और कई बार लोग उनके विरुद्ध मानहानि का दावा भी करते हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ हमारे ऊपर जिम्मेदारी भी आ जाती है कि वह प्रामाणिक हो और हानिरहित हो. आज कल अपने स्वार्थ के लिए गलत सूचना देना और विवाद पैदा करने की घटनाएँ भी सुनने में आती हैं . अब संचार साधनों की बहुतायत के साथ अभिव्यक्ति के सामने नए प्रश्न खड़े हो रहे हैं. अखबार हमारे आँख-कान बन रहे हैं. पर प्रायोजित समाचार और ‘पेड न्यूज’ भी छाप दी जा रही है. जहाँ ट्वीटर, ब्लॉग और फेस बुक जैसे सोशल मीडिया के माध्यम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यापक करने का अवसर देते हैं वहीं उनका दुरुपयोग कठिनाइयां भी पैदा करता है.कभी-कभी यह दुराग्रह का अभियान बन जाता है. अश्लील वीडियो लोग ‘वाइरल’कर देते है. कोई भी अभिव्यक्ति निरपेक्ष नहीं होती है. अतः एक नागरिक के रूप में हमारा दायित्व बनता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो रहे पर उसका प्रयोजन लोक और समष्टि का हित बना रहे इसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए.
धरती पर मनुष्य ही अकेला जीव है जिसके लिये उसकी शारीरिक और भौतिक जीवन नाकाफ़ी या अपर्याप्त होता है क्योंकि वह अपनी बुद्धि के बल पर इसके पार भी झांक पाता है । उसकी रची संस्कृति उसकी उपस्थिति को निरंतरता देते हैं । मनुष्य स्वयं अपने को रचता है और उसकी सर्जना एक बडा हस्तक्षेप होती है । लक्ष्यों या मूल्यों की सर्जना भी ऐसा ही हस्तक्षेप है । मूल्य का जगत संभावना का जगत है और इनका प्रयोजन मनुष्य को राह दिखाना है। मनुष्य आहार (भोजन) , निद्रा, भय, और मैथुन (सेक्स) की पशु वृत्तियों तक अपने को सीमित न रख मूल्यों को खोजता है जिन पर जीवन को भी न्योछावर किया जा सके।
मानव जीवन कुछ स्पृहणीय लक्ष्यों या चाहतों के तहत संचालित होता है। इन चाहतों पर कोई बन्दिश नहीं होती , सिवाय खुद अपने द्वारा लगाये गये प्रतिबन्धों के । प्रतिबन्ध न हों तो ये चाहतें आदमी को कहीं भी ले जा सकती हैं। ‘ धर्म ’ इसी अर्थ में मनुष्य की विशेषता है जो उचित और अनुचित के बीच तथा ग्राह्य और अग्राह्य के बीच भेद करने का विवेक प्रदान करता है । इस विवेक के न रहने पर हम पशुवत आचरण करने लगते हैं और तात्कालिक भौतिक सुख पाने तक ही अपने को सीमित कर लेते हैं । अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना ) , अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना) , शुचिता, इन्द्रियनिग्रह, धैर्य, और क्षमा जैसे गुणों को ‘धर्म’ के अन्तर्गत शामिल कर मनुष्य को बडी जिम्मेदारी दी गयी। ‘धर्म’ व्यक्ति को अपने बारे में कम और दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करें या सामाजिक जीवन कैसे जियें इसके बारे में अधिक बताता है।
सांस्कृतिक यात्रा में जंगल से कृषि और फ़िर सामुदायिक जीवन की ओर आने पर मनुष्य को अकेले प्रयास के बदले परस्परनिर्भरता की ओर अग्रसर हुआ । मानवीय कल्पना का यह सामाजिक आयाम व्यक्तिकेन्द्रिकता से आगे जा कर भरोसा , उत्तरदायित्व की भावना और सहयोग के लिये आमंत्रित करता है । मूल्यों की संकल्पना समाज के लिये वांछनीय या आदर्श व्यवहार के खाका के रूप में हुई । परोक्ष और अपरोक्ष रूप से मूल्य हमें कुछ कार्यों को करने के लिये प्रोत्साहित करते हैं और कुछ के लिये बरजते हैं।
आज भारत में सार्वजनिक तौर पर समाज के ऊपरी तबके के लोगों के आचरण स्वीकृत मूल्यों के विपरीत या भ्रष्ट हो रहे हैं । भ्रष्ट आचरण का तात्पर्य ऐसा आचरण है जो गैरकानूनी और अनैतिक हो और अपात्र को लाभ पहुंचाने के लिये किया गया हो। प्रायः गलत साधनों से धन एकत्र करना और भौतिक सम्पत्ति अर्जित करना इसका सबसे प्रचलित तरीका है। इन सबके पीछे असीमित धनलिप्सा प्रमुख कारण है। आज सत्ता के मूल्य फ़ौरी लाभ , शक्ति का संचय और सत्ता पर काबिज बने रहने की जुगत तक सिमट गये हैं । उसे प्रजा सुख की चिन्ता नहीं है ।
आज सत्ता भ्रष्टाचार का प्रतीक और पर्याय बनती जा रही है। शीर्ष पर स्थित लोग भ्रष्टाचार के एक से एक मानदंड स्थापित कर रहे हैं। आज नेता, प्रशासक, अधिकारी, न्यायाधीश, पुलिस और हर स्तर के सरकारी कर्मचारी सभी भ्रष्टाचार गिरफ़्त में हैं। उनकी सम्पत्ति में अलौकिक वृद्धि भ्रष्ट तरीकों के बिना संभव ही नहीं है। जनता का अहित कर , उसे धोखा दे कर और अनुचित तरीकों का उपयोग करते हुए स्वार्थसाधन राष्ट्रद्रोह है। वे सभी जल्दी से सम्पन्न बनना चाहते हैं और इस आकांक्षा की कोई ऊपरी सीमा नहीं है।
रूपये से चुनाव जीतना और जीत कर फ़िर रूपये इकट्ठा करना अधिकांश नेताओं का अन्तहीन व्यसन हो चला है। राजनैतिक हल्कों में स्वार्थ न्यूनतम साझा कार्यक्रम हो गया है जिसके मार्ग में घोर वैचारिक भिन्नता भी आडे नहीं आती। मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री का जेल जाना , दागियों को मंत्री बनाना, सीवीसी के चयन में गडबडी और उसे तब तक सही ठहराना जब तक वह न्यायालय से निरस्त न हो जाय, उच्च और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों पर संगीन आर्थिक आरोप, और प्रदेश के मुख्यसचिव को जेल कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो सत्ता की बखिया उधेड रहे हैं। जब उत्तरदायी व्यक्ति अपने उत्तरदायित्व का वहन नहीं करता है या उसकी उपेक्षा करता है तो वह आम आदमी के दुख का कारण बनती है।
आज भारतीय समाज जिन प्रमुख समस्याओं से ग्रस्त है उनमें भ्रष्टाचार की समस्या न केवल सबसे रमुख है अपितु वह स्वयं कई समस्याओं की जड में है । चूंकि सामाजिक जीवन परस्पर्निर्भरता पर आश्रित है , यह आवश्यक हो जाता है कि एक दूसरे के प्रति दायित्वों का निर्वाह किया जाय। यह बात प्रत्येक सामाजिक संगठन पर लागू होती है। परिवार, गांव, समुदाय , नगर , प्रदेश और देश चाहे जिस स्तर के संगठन की कार्यप्रणाली देखी जाय तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इनका संचालन करने के लिये यह अनिवार्य रूप से अपेक्षित हो जाता है कि आचरण की शुचिता अक्षुण्ण रखी जाय । जब हम अपेक्षित या स्वीकृत मानकों का विरोध करते हैं या उनसे परे हट कर अपना आचरण संचालित करते हैं तो हम भ्रष्टाचार के दोषी हो जाते हैं।
भ्रष्टाचार के प्रति हमारा आकर्षण , जिसके बशीभूत हो कर लोग उसमें लिप्त होते हैं इतना प्रबल होता है कि वे उसके लिये जोखिम उठाते हैं , झूठ बोलते हैं और वह सब कुछ करते हैं जो गर्हित है और न करने योग्य होता है। इसके मूल में संभवतः लोभ की प्रवृत्ति होती है अर्थात अपात्र द्वारा अवांछित लाभ उठाने की चेष्टा की जाती है। कहना न होगा कि भ्रष्टाचार के सबसे अधिक मामले आर्थिक श्रेणी के होते हैं। विगत वर्षों में , खास तौर पर 1990 के बाद के उदारीकरण के दौर में जितने घोटाले हुए हैं , उन पर दृष्टिपात करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उसमें ऊंचे तबके के और सम्पन्न लोग जिनमें राजनेता, प्रशासनिक और पुलिस महकमे के बडे सरकारी अधिकारी और न्यायपालिका के लोग काफ़ी बडी संख्या में सम्मिलित हैं और दिन प्रतिदिन इनका पैमाना बढता ही जा रहा है। भ्रष्टाचार सत्ता हथियाने, सम्पन्न होने का शार्तकट साबित हो रहा है। हमारी प्रशासनिक व्यवस्था और न्यायिक व्यवस्था की लालफ़ीताशाही, जटिलता , समय के प्रति लापरवाही आदि के कारण इस बात का मौका मिल जाता है कि सन्देह का लाभ आसानी से मिल जाने से अपराधी निर्भय हो जाते हैं।
वस्तुतः सत्ता मूल्यनिरपेक्ष होती जा रही है और मूल्यों की सत्ता कमजोर पडने लगी है। आज देश की मुख्य चिन्ता सत्ता और शासन के गलियारों में व्याप्त भ्रष्ट आचार से निजात पाने की है। जन लोकपाल विधेयक के पक्ष में जन्तर मन्तर पर अनशन पर बैठे अन्ना हजारे के सात्विक विरोध के सुर में देश की सारी जनता का सुर मिला था। उनको अपार समर्थन से स्पष्ट सन्देश मिलता है कि भ्रष्टाचार स्वाभाविक नहीं है और उसके खिलाफ़ आम आदमी में क्षोभ और आक्रोश है। सत्ता की व्यवस्था ऐसी है कि अपराधियों को दंड भी नहीं मिल पाता है। आम आदमी हताश होता जा रहा है। लोग चाहते हैं कि सत्ता भ्रष्टाचार से मुक्त हो। अन्ना के प्रयत्न से मूल्य-चेतना की सुगबुगाहट बढी है । अभी भी राजनेता मुक्त मन से लोकपाल विधेयक का स्वागत करते नहीं दिखते और इसे अमली जामा पहनाने में जरूर बाधा आयेगी । आवश्यकता है कि इस चेतना की लौ जलाए रखें और भ्रष्टाचारमुक्त समाज की परिकल्पना को साकार करें।
हमारे पर्यावरण की स्थिति कितनी बिगड़ती जा रही है यह बात किसी से छिपी नहीं है. अक्सर हम उसमें काट छांट कर हम अपने सुख के लिए जगह बना लेते हैं, बिना यह सोचे के हमारे हस्तक्षेप का क्या परिणाम होगा. पर जब प्रकृति का सन्तुलन बिगड़ता है तो ऐसे-ऐसे हादसे होते हैं जिनका फल पीढी दर पीढी भुगतती है. पर हमारा मन जो बाजार को ही अपने आचरण का आधार बनाता जा रहा है अपने पर्यावरण को संसाधन मानता है जो सिर्फ हमारे उपयोग के लिए है. तब हम पर्यावरण के साथ सिर्फ संचय और भोग का ही रिश्ता देख पाते हैं. अचल (या जड़!) संपत्ति को निर्जीव मानने का मुगालता हमको प्रकृति के प्रति कुछ ज्यादा ही निर्मम बना देता है और हम उसका हर तरह से दोहन करने की छूट ले लेते हैं. महाकवि कालिदास पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश आदि को ईश्वर के प्रत्यक्ष रूपों में परिगणित करते हैं और इन सबकी पूजा अर्चना भी की जाती है. नदियों को तीर्थ माना जाता है. उनमें स्नान की महत्ता है. प्राण प्रतिष्ठा के बाद देवी देवताओं की प्रतिमाएं सिर्फ भौतिक जड़ पदार्थ नहीं रह जातीं.उनका स्वरूप उदात्त हो उठता है और वे अनुभव में जीवंत हो उठती हैं. वनस्पतियों और जीव जंतुओं में तो जीवन माना जाता है पर प्रकृति की जीवन्तता और उसके साथ साझा रिश्ता नहीं रखते. एक तरह से हम प्रकृति के प्रतिद्वंदी बन खड़े होते हैं और अधिकार जमाने की जुगत में लग जाते हैं.
प्रकृति के अतिशय रूप (जैसे- जब अनावृष्टि या अतिशय वृष्टि होत्ती है) से उसकी शक्ति का अंदाजा लगता है. हम भूल जाते हैं कि प्रकृति स्वतः प्राप्त तो है पर वह सीमा भी है और संभावना भी. वह यह तंय करती है की हम क्या कर सकते हैं और क्या नहीं कर सकते. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सहांरे हम उस सीमा का परिमार्जन कर अतिक्रमण करते हैं और उसके दुष्परिणाम भी भोगते हैं. हम इस बात की अनदेखी कर जाते हैं कि सृष्टि में जो कुछ है पह एक दूसरे पर अवलंबित है. जल से वाष्प , फिर बादल और तब पानी बरसते तो हम देखते ही हैं. बीज से पौधे, फिर वृक्ष, फूल, फल और फिर बीज का क्रम भी देखते हैं. यह भी देखते हैं कि हर पौधा हर कहीं नहीं उग सकता और यदि उगे भी तो पनप नहीं सकता और पनपे भी तो जरूरी नहीं कि उसमे फूल फल लगें. विभिन्न वनस्पतियों के जीवन के लिए ख़ास तरह की जमीन और जलवायु चाहिए ही चाहिए. वहीं वे स्वाभाविक रूप से और अपनी विशेषताओं के साथ विकसित हों सकेंगे.अर्थात प्रकृति के अपने नियम होते हैं जो यह निश्चित करते हैं कि क्या संभव है और उसके दायरे में ही चीजों के घटित होने का ख़ास क्रम होता है. उसी के हिसाब से उसका केलेंडर भी बना होता है. तभी तो पेड़ों में आम, अमरूद, लीची, सेव आदि फल एक ख़ास समय से आते हैं. कोयल भी ख़ास समय पर कूकती है और मोर नाचते हैं. अर्थात्त जीवन साझे का व्यापार है.
कहा गया है कि इस धरती पर तीन ही रत्न पाए जाते हैं – अन्न, जल और सुभाषित. पहले दो प्रकृतिप्रदत्त हैं और तीसरा मानव के अपने आचरण और सहकार से जुड़ा हुआ है. ये सभी यह अपेक्षा करते हैं कि हम प्रकृति में उपस्थित जीवन क्रम के सूत्र को पहचानें और उसका आदर करें. फसलें कब उगेंगी और कब कटेंगी यह प्रकृति के नियम पर ही निर्भर करता है. प्रकृति हमें प्रचुर मात्रा में अवसर देती है और मनुष्य उस अवसर का अपनी बुद्धि से दुरुपयोग या सदुपयोग करता है. यह सब जीवन में इस तरह घुलमिल जाता है कि पता ही नही चलता की कब पुण्यतोया मोक्षदायिनी माता गंगा और कृष्ण की लीला की साक्षी यमुना मलवाहिनी हो जाती हैं. अब उनका जल अनेक स्थानों पर इतना प्रदूषित हो चला है कि पीने योग्य नहीं रहा. वन हों या वनराज; नगाधिराज हिमालय हो या रत्नाकर समुद्र हमारे भोग की लिप्सा ने किसी को नहीं बख्शा है. हमने न केवल उनका अन्धाधुंध दोहन आरम्भ किया बल्कि उन्हें कचरों से पाट दिया. आज एवरेस्ट शिखर पर नियमित एकत्र होते कूड़े को हटाना एक बड़ा काम हो गया है. मानव सभ्यता की एक अनिवार्य उपलब्धि कूड़ा-कचरा है और उसमें बहुत सा ऐसा भी है (जैसे- न्यूक्लियर कचरा) जिसका समय अंतहीन है और उस कचरे को सुरक्षित रखना भी एक मंहगे इतजाम की अपेक्षा करता है. इतने तरह का कचरा हम जमीदोज करते जा रहे हैं कि अनेक स्थानों पर जमीन के नीचे का पानी बुरी तरह प्रदूषित हो चला है और पेय जल की उपलब्धता जटिल समस्या बनती जा रही है. नदियों का प्रवाह, उनका मार्ग, उनकी सफाई सभी हमारी जिम्मेदारी है और हम इससे मुकर गए. धर्म के अनुष्ठान जरूर होते रहे और नदी किनारे मेले लगते रहे. नदियाँ हर मेले के बाद पहले से और भी गंदली होती गईं पर किसी ने उनका हाल नहीं लिया. सभ्य कहलाने और शिक्षा के गढ़ कहे जाने वाले शहर, महानगर और मेट्रो सिटी की तो बात ही नहीं कहनी. वहां तो अब सांस लेने के लिए शुद्ध वायु मिलना संभव नही रहा.
हमारी आधुनिक (पर संकुचित!) सोच में प्रकृति और पर्यावरण भी एक उपभोग्य पदार्थ ( या संसाधन!)हो गया जिसका ज्यादा से ज्यादा उपभोग कैसे किया जाय यही पुरुषार्थ बन गया. आज ऐसे बहुत सारे स्थान हैं जहां प्रकृति कराह रही है, पीड़ित है और जीवन के लिए भीख मांग रही है. धीरे-धीरे सारे जल-श्रोत सूखते जा रहे हैं, खुदाई से पहाड़ लुप्त हो रहे हैं, वन्य जीवों की ह्त्या हो रही है और जंगल बेतहाशा कट रहे हैं. हम खुद जहां रहते हैं वह ऎसी ही जगह बनती जा रही है जहां नैसर्गिक के स्थान पर कृत्रिम का ही पसारा है और हम ऐसे तमाम कामों में संलिप्त रहते हैं जिनसे पर्यावरण को खतरा बढता है. तरह तरह की घातक गैसों का उत्सर्जन, कूड़ा पैदा करना और पानी बिजली का दुरुपयोग इनमें मुख्य हैं. कुल मिला कर पर्यावरण अर्थात हमारी अपनी वासस्थली तहस-नहस होती जा रही है. उसकी धारण करने की सीमाओं की खींचतान मची हुई है.
शायद हम अपने में इतने डूबे रहे हैं कि यह भूल ही गए कि प्रकृति निर्जीव वस्तु नहीं है. उसमें भी जीवन का स्पंदन और चेतना है और उसे भी किसी मानव शिशु की ही तरह पोषण, देख-रेख (केयर!), संरक्षण, सुरक्षा की जरूरत होती है. पर इससे भी ज्यादा जरूरी बात हमारे दृष्टिकोण की है कि हम और हमारे आस-पास के पौधे, जंगल, झाड़ी, नदी, पहाड़ यानी कि हमारे पर्यावरण के पड़ोसी दोनों के बीच कैसा रिश्ता हो. आज हम मालिक और शेष हमारे ताबेदार सरीखे हैं. हम प्रकृति के बारे में फैसला लेते हैं. पर सच्चाई तो यही है कि हम मनुष्य भी उसी देशकाल के वासी हैं जहां प्रकृति के शेष सदस्य भी रहते हैं. शेष प्रकृति को भी जीने का, स्वस्थ्य रहने का और विकसित होने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए जैसे हम अपने लिए सोचते हैं. यदि हम यह सोचें कि सृष्टि पहले से थी और हम भी यहाँ प्रकृति की गोद में बसने पहुंचे, शरण लिए और जीवन चलाने के सभी साधन प्राप्त किए तो उसके लिए तो पवित्र मन से प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए था. प्रकृति के बीच जो जीवन हम वृक्षों, फलों, पुष्पों मनुष्य समेत जीव जंतुओं में महसूस करते हैं वह किसी अगोचर शक्ति या नियम के सृजन का लास्य ही तो है. जीवन मूल्यवान है और वह प्रकृति से जुड़ने में ही संभव है क्योंकि उसका यही स्वभाव है. आज मनुष्य प्रकृति के लिए सबसे खतरनाक प्राणी होता जा रहा है. बुद्धि की श्रेष्ठता का यह तकाजा तो नहीं होना चाहिए. जीवन वस्तु नहीं प्रक्रिया है, एक ऎसी प्रक्रिया जिसमें एक दूसरे पर अवलंबन होता है. हमारा भविष्य इसी पर टिका है कि हम सृष्टि में पूरक बन कर सब के साथ रहना कैसे सीखते हैं. स्वयं प्रकृति तो सब के लिए है हमें उसके लिए न सही अपने जीवन के लिए उसका संरक्षण करने का उद्यम तो करना ही होगा.
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प्रश्नपरक जिज्ञासु भारतीय मानस चिन्तन-मनन से बडी गहराई से जुडा रहा है । सृष्टि और उससे परे ‘उसे’ जानने की तीव्र इच्छा – ‘ तत विजिज्ञासस्व ’ , उसके जीवन यात्रा के लिये प्रमुख प्रस्थान विन्दु रही है। उस सर्वव्यापी सत्य या ईश्वर की उपस्थिति को हर जगह देखना उसके सहज स्वभाव में था । तभी तो उसने कहा-
ईशावास्यमिदम सर्वं यत्किंचित जगत्यां जगत ।
तेन त्यक्तेन भुन्जीथाः मा गृधः कस्यस्विदधनम॥
जो भी कुछ इस दुनिया में है वह ईश्वर से अनुप्राणित है , उसी की प्रसादी मानकर भोजन करना चाहिये और किसी दूसरे का धन नहीं लेना चाहिये।
भारतीय मानस चकित था और जानना चाहता था कि मन, प्राण , वाणी, आंख, कान किसके कहे से सक्रिय हो कर अपना- अपना काम करते हैं। फ़िर समाधान भी ढूंढा और महसूस किया कि वही तो है आंखों की आंख और कानों का कान । पर उस तक पहुंचना संभव नहीं । वहां न आंखें पहुंच पाती हैं न वाणी ही। वह क्या है इसे कोई नहीं जान सकता , जिन्होंने जाना है उन्होंने जो बताया है उसीसे पता चलता है।
केनेषितं पततिप्रेषितं मनः केनप्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः
केनेषितंवाच्मिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उदेवो भुनक्ति
श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यतः वाचो हवाचं स उ
प्राणस्यप्राणः चक्षुष चक्षुः अतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्मात लोकात अमृता भवन्ति।
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाक गच्छति नो मनो
न विद्मो न विजानीमो यथैतद अनुशिष्यात
अन्यदेव तत विदितात अथो अविदिताताधि
इति शुश्रुम पूर्वेषां मे नः व्याचचक्षिरे ।
इस परिवर्तनशील संसार में जो कुछ भी है वह ईश्वराच्छादित होना चाहिये। मनुष्य को त्याग से अपना भरण पोषण करना चाहिये। उसे किसी दूसरे के धन का लोभ नहीं करना चाहिये। त्यागते हुये भोग की अभिलाषा ही परिवर्तनशील जगत में जीते हुए नित्य और चेतन आधार को दिला सकती है और शान्ति की अनुभूति भी । त्याग की पवित्र दृष्टि से ही मनुष्य जीवन की संसिद्धि हो सकती है। इसी में विकास की पूर्णता है। सतत कर्म करते हुये सौ साल जीने की कामना करनी चाहिये । ऐसा करते हुये आदमी कर्म के बन्धन से मुक्त रहता है :
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत शतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथे तोस्ति न कर्म लिप्यते नरः॥
बाह्य और अन्तस का संश्लेषण करने से ही समग्र का सम्यक बोध संभव है। सार्वभौम चेतना में स्व या आत्म की प्रतिष्ठा- समस्त चित्त – अचेतन, चेतन और अतिचेतन का विकास । आधुनिक मनुष्य का संकट है क्रोध, भय, लोभ, वेग, अस्वस्थ आकांक्षा और प्रतियोगिता से कैसे पार पावें। यह सब मन की कारस्तानी होती है । मनुष्य का मन ही उसके बन्धन और मुक्ति का कारण है ।
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयोः
हम जैविक और मानसिक प्राणी ही नहीं अपितु आध्यात्मिक प्राणी भी हैं। धैर्य से साधना करने पर विशिष्ट ज्ञान से उस स्वरूप का दर्शन होता है, वह रूप – अमृतरूपी आनन्द-का होता है। परम सत्ता रसरूप है-तरल, प्रवाहयुक्त –जो प्राणयुक्त करता है
रसो वै सः। रसं ह्येवान्यात कः प्राण्यात यदेष आकाश आनन्दो न स्यात।
आज जब हम भारतीय मानस की बात करते हैं तो उसके कई अर्थ होत हैं। एक तो वह् मानस जो आज तमाम दबावों और संकटों से जूझ रहा है । उसके सामने बडी – बडी उपलब्धियां हैं ; उनकी चकाचौंध में जी रहा है। वह आर्थिक, भौतिक हर तरह की उपलब्धि के पार जाना चाहता है। संस्कृत के प्रसिद्ध कवि भर्तृहरि ने कहा था-
भोगा न भुक्ताः वयमेव भुक्ताः
तापो न तप्तो वयमेव तप्ताः।
कालो न यातो वयमेव याता:
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा॥
भोग न मिटे हम ही चुक गये
ताप न तपे हमीं तप गये।
काल न बीता हमीं बीत गये
चाह न मिटी हमीं मिट गये॥
शंकराचार्य की प्रसिद्ध चर्पट मंजरी में भी यही कहा गया है।
आज हम एक ऐसी दौड में शामिल हैं जिसका कोई अन्त नहीं दिखता । बाहरी विकास तो बहुत हुआ , भौतिक विकास को लक्ष्य बनाया गया और हम उपलब्ध करने में जुट गये। आइये भारतीय मानस को देखें । ॠगवेद में कहा गया ‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात । तैत्तिरीयोपनिषद में कहा गया आनन्दो ब्रह्मणो विद्वान । तस्य प्रियमेव शिरः, मोदो दक्षिण पक्षः, प्रमोदो उत्तर पक्षः । छन्दोग्योपनिषद का वचन है- ‘यो वै भूमा तत्सुखं । नाल्पे सुखमस्ति’। खूब ज्यादा होगा तो सुख होगा। ‘रसो वै सः’ कह कर रस को परम सत्ता माना गया। उपनिषद में एक स्केल दिया है – सुख आनन्द की इकाई है। इन सबमें आंतरिक आनन्द को ही सबसे बडा आनन्द माना गया। दूसरी ओर भोग के जीवन में दुख ही दुख है। उसे हटाने के साधन भी हैं , बाहर झांको द्ख ही दुख मिलेगा। यह जगत का स्वभाव है । कठोपनिषद और गीता बाहर लगी आग की ओर संकेत करते हैं – सर्वत्र दुख है। यह आग जलायेगी ही।क्या इस समस्या का कोई समाधान है ? कोशिश की गयी । आश्चर्य की बात है कि आज इक्कीसवीं सदी में आधुनिक मनोविज्ञान सकारात्मक मनोविज्ञान (पाजिटिव साइकालजी) का विकास करने में लगा है और तमाम सकारात्मक प्रवृत्तियों को बढाने पर जोर दे रहा है। इसके अनुसार यदि आप हंसते हैं तो यह हंसी और प्रसन्नता कवल वर्तमान ही नहीं आपके भविष्य की प्रसन्नता को भी सुरक्षित करती है, उसकी गारंटी देती है।
हम दुख का कारण ढूंढ रहे थे और कई रास्तों से चल कर इसकी पडताल शुरू हुई। एक बात जो समझ में आई वह यह थी कि सारी समस्या की जड अपनी सम्झदारी है। प्रश्न है- तुम हो कौन? आप खुद से पूछिये- आप कौन हैं ? शंकराचार्य ने कहा ‘शिवोहं शिवोहं’ । जरा सोचिये यह कहना कितना ठीक है। पाश्चात्य मनोविज्ञान में फ़्रायड ने अचेतन में व्याप्त कठिनाइयों और चिन्ताओं की ओर ध्यान दिया तो जुंग और पीछे सामूहिक अचेतन की ओर चले। वर्तमान में देखेँ तो सब की जड आपकी अपनी समझ में मिलेगा। आप क्या हो? पाश्चात्य चिन्तन ‘इगो’ या अहं में ही सब कुछ समाविष्ट मानता है। उसी की सेवा, रक्षा, अभिवृद्धि ही सब कुछ है। उसे पोल पास कर बढाया जाय , उसे प्रचड बनाया जाय। सब कुछ इसी अहं का विस्तार है। यह तमाम रूपोंमें होता है। शरीर, वस्त्र , जिसे भी आप अपना कह ले ‘माइन’ वहां तक इस तरह के आत्मभाव का विस्तार है। मनोविज्ञान अधिकांशतः इसी पर बल देता है।इसे संभाल कर रखो। कहना न होगा कि आत्म की अधिंकांश व्याख्यायें और सिद्धान्त अहं का ही विस्तार करते हैं। पर मनुष्य की यह अवधारणा ठीक नहीं है। वह आधी अधूरी है। वह प्रज्ञावान जीव सब प्राणियों को अपने में देखता है , सब्को अपनी आत्मा में देखता है , किसी से घृणा नहीं करता उसे कौन सा मोह , शोक हो सकता है जो अपनी आत्मा का स्वरूप मानता है।
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते।
यस्मिन सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभुद्विजानतः
तत्र को मोहं कः शोकः एकत्वं अनुपश्यतः॥
अहं का मनोविज्ञान कहता है अकेले करते चले जाओ। सारी दुनिया उसी के लिये है। पर यह ठीक नहीं है। यह एक रुग्ण मानसिकता है। एडलर सामाजिक रुचि की बात करता है भारतीय मानस संकेत करता है कि मनुष्य जैविक प्राणी है , मनुष्य सामाजिक प्राणी है, पर वह आध्यात्मिक प्राणी भी है। वह आत्मिक शरीर है। उसकी सत्ता ‘इगो’ की परिधि से बाहर है और उसका विस्तार अनन्त आंतरिक जगत में है। उपनिषद इसी अन्तर्यात्रा की ओर चलने का न्योता देते हैं।
विद्या अवसर देती है संभावना जगाती है। ‘ विद्या विहीनः पशुः’ ,’ ॠते ज्ञानान्मुक्तिः’ तथा ‘विद्यया अमृतं अश्नुते’ जैसे वाक्य अहं वाले व्यक्ति की बात नहीं करते। ये मनुष्य को ऊंचे स्तर की ओर उठने के लिये उसका आवाहन करते हैं। यही योग का – जुडने का अभिप्राय है। परम सत्ता से जुडना ही अभीष्ट है।उससे जुडिये जिससे बडा कुछ नहीं है।उसके साथ तादात्म्य करने से ज्यादा विस्तार होगा। हम वस्तुओं से जुड कर अपनी सामर्थ्य का उद्घोष करते हैं । अंततोगत्वा सब धरा का धरा रह जाता है। माता, पिता, पत्नी, पुत्र, पति, भाई, मित्र किसी के साथ भी स्थायी जोड नहीं होता। यह गंभीरता से सोचने की बात है कि ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिससे स्थायी या नित्य सम्बन्ध बनाया जा सके। हर योग केवल वियोग की ओर ले जाता है। ऐसा योग जो निरंतर रहे, निर्विघ्न हो, नित्य हो केवल पर्मात्मा से ही हो सकता है जो वस्तु नहीं है। उसे आधार बनाने पर सोचने कि दृष्टि का विस्तार होता है। वेदान्तियों की सुनें ‘तत्वमसि – अहं ब्रह्मास्मि’ तो खाम खयाली लगती है। तुम क्या हो इसका ठीक उत्तर जरूरी है। आत्म की ऐसी परिकल्पना है जिसके आगे सब छोटी पड जांय । ब्रह्म, आत्मन का स्वरूप मानने पर एक व्यापक और विराट पवित्र अस्तित्व का अहसास मिलता है। अपना विस्तार प्रिय है। पर भौतिक विस्तार विस्तार न हो कर संकोच है। यह बात हमारे मानस में गहरे पैठी है। यह शरीर मिथ्या है यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। मृत्यु के बाद शरीर जला देते हैं । जो हम हैं वह शरीर नहीं है।
आत्मानं रथिनं विद्धि मनः प्रग्रह्मेव चi
न्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांतेषु गोचरां
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः
गीता और कठोपनिषद दोनों में रथ का रुपक लिया गया है। आत्मा रथी है- रथ प्स्र सवारी करने वाला , इन्द्रियां घोडे – कहीं भी ले जा सकते हैं और दुष्ट हुए तो गिरा भी सकते हैं। यदि बुद्धि का नियंत्रण न हो तो कुछ भी कर सकते हैं। मनोविज्ञान की भाषा में यह कंडीशनिंग जैसा है। बाहैइ वस्तुयें हमें नचा रही हैं कोई प्रशंसा स्तुति कर काम करा लेता है। आपके अपने नियंत्रण का केन्र्द्र आपके अन्दर नहीं बाहर है। वह स्वतःस्फ़ूर्त नहीं बरन बाहर से आरोपित है।
किस तरह आत्म का विस्तार हो ? आज देश में कुछ खरबपति जरूर पैदा हो गये हैं , प्रसिद्ध फ़ोर्ब पत्रिका में उनका उल्लेख है। पर गरीब कितने हैं इसकी चिन्ता नहीं है । वे चिन्ता की परिधि के बाहर हैं। आज बाहर का बदलाव तेजी से हो रहा है और वह संकुचित संकीर्ण आत्म का उत्सव मनाता है । पर यह प्रवृत्ति स्वयं अपने लिये, समाज के लिये , विश्व के लिये खतरनाक है। व्यापक आत्म भाव से ही पूर्ण मनुष्य की रचना हो सकेगी। दूसरों को भी जीने का हक है । भारतीय मानस में इसकी गुंजाइश रही है। यह आश्चर्य जनक है कि अंग्रेजी के निजी वक्तिगत सेल्फ़ का कोई अच्छा अनुवाद नहीं है – आत्म, स्व, अहं हैं पर वे काम चलाऊ हैं। परंपरा के शब्द हैं – पुरुष , पुमान, आत्मन, ये सभी किसी इंडीविडुअल सेल्फ़ की अवधारणा को स्पष्ट नहीं करते।
आज भी हमारे अवचेतन में विस्तृत सेल्फ़ मौजूद है। आप अपने बारे मे जब सोचते हैं तो उसमे अक्सर और भी शामिल हो जाते हैं। माता पिता , मित्र ये सभी शामिल हो जाते हैं। ऐसे ही आप भी मां की चिन्ता में शामिल होते हैं। शायद विस्तृत सेल्फ़ मौजूद रहता है और समाज उसे अकेला बना रहा है, वह सिकुडता जा रहा है। हम अपना बायोडाटा बनाते हैं पर कालिदास और तुलसी दास की कविता जीवित है और उनके जन्मस्थान और माता पिता का ठीक पता नहीं है। ॠगवेद के गान करने वाले का नाम अहीं ज्ञात है । वे द्रष्टा थे। ओह ज्ञान व्यक्ति की सम्पत्ति न था निजता नहीं । तो हमारा स्वभाव या प्रकृति ऐसी नहीं थी। हम तो मानते थे – जो कुछ है ब्रह्म है और यह जानना ही ब्रह्म होना है । आत्म विस्तार सबसे – पशु, पक्षी, वायु , वृक्ष , वनस्पति सभी से। शान्तिपाठ में सभी आते हैं । सभी साथ रहें, जियें , सुशोभित हों। शोभा अकेले की नहीं , सबसे जुड कर।
शरीर सीमा नहीं है । विचार जीवित रहते हैं जुडना भविष्य का निर्माण है। व्यापक आत्म भाव अस्तित्व का विस्तार है , संभावना बनती है , हम जी सकते हैं। मनुष्य के उदात्त पक्ष की ओर , ऐसे विकास की ओर जिसमें परस्पर विरोध न हो अविरोध वाला विकास। मनुष्य के रूप में हमें ऐसी शक्तियां मिली हैं जो सोचने, भाषा के उपयोग की क्षमता , स्वयं अपने बारे में सोच सकने की क्षमता हम सब्जेक्ट और ओब्जेक्ट दोनो हैं। आप में निर्णय लेने की , स्वतंत्रता की क्षमता है , बदलाव ला सकते हैं । मन से ही सब कुछ पैदा होता है। आपकी इच्छा , आपका संकल्प सब कुछ का कारण है। महात्मा गांधी ने अधेंरी रात में देखा एक सपना और चल पडे उस ओर्। आप भी सोंचे ।
एक सांस्कृतिक प्राणी होने के कारण मनुष्य सामाजिक संचार में शामिल रहता है और जटिल प्रतीकात्मक संचार हेतु उपकरण और संस्थाओं का विकास करता है , आविष्कार करता है। विभिन्न ज्ञान समूहों में सांस्कृतिक परस्पर प्रभाव (एकल्च्ररेशन) होता है। वैश्विक सांस्कृतिक सम्बन्ध महत्वपूर्ण हो रहे हैं क्योंकि अब समस्याओं का स्वरूप जसे पारिस्थितिक गिरावट भूमंडलीय स्तर पर ही समझी जा सकती है। इस सन्दर्भ में सहकारी सीखना (कोलैबोरेटिव लर्निंग) को महत्वपूर्ण माना जाने लगा है। सूचना संसाधनों का प्रभावी और सॠजनात्मक उपयोग करने के नये अवसर मिल रहे हैं ।
विद्यालय और घर के सम्बन्ध , संसाधन, उपलब्ध वातावरण , अवकाश का समय, विवेक का विकास , विशेषज्ञता , बहु-बुद्धि का सिद्धान्त को नया आयाम दे रहे हैं। अब ज्ञान की कोटियों को नैसर्गिक नहीं माना जाता । उसमें सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विशिष्टता पायी जाती है और ज्ञान सामाजिक प्रक्रियाओं द्वारा स्थापित और प्रशासित होता है। उसके राजनैतिक आशय को नजरन्दाज नहीं किया जा सकता। सत्य का सापेक्ष्य रूप सहिष्णुता की अपेक्षा करता है। ज्ञान , जो हम जानते हैं । बाहरी जगत मानस में किस तरह आता है , वह कितना शुद्ध होता है / कांट की मानें तो यथार्थ (नोऊमेनोन) और हमारे अनुभव या प्रतीति ( फ़ेनोमेनोन) के बीच सीधा सम्बन्ध नहीं है । वह कहता है कि सिद्धान्तहीन अनुभव अंधा और अनुभवहीन सिद्धान्त एक कोरा वाग्जाल होता है । हमारी समझ पूर्वकल्पित ज्ञान और अनुभव पर आश्रित है। हमारे पास हमारे प्रत्यक्ष की व्याख्या है जिससे बाह्य स्थित जगत का पता चलता है। यह कल्पित है। ज्ञान का अधिकार ज्ञान समुदाय को है , या कहें कि ज्ञान का आधार ज्ञान समुदायों में है। संरचनावादियों के अनुसार यथार्थ व्यक्ति द्वारा उसके अनुभव के माध्यम से गढा जाता है। क्या ज्ञान ठीक ठीक प्रतिनिधित्व करता है ? विज्ञान मानसे के सम्प्रत्ययन का उतपाद है। ज्ञान उन आविष्कारों का संपुंजन है जो अनुभव जगत के अनुरूप होते हैं। सीखना ज्ञान का संचार नहीं पूर्व अनुभवजन्य अर्थ के आधार पर व्याख्या है। अनुभव ज्ञान की सीमा है और अनुभव में सतत अभिकर्ता संलग्न होता है। अपनी अस्मिता और सम्बन्धों का जाल उससे जुडा होता है।
वीको का कहना है कि जो बनाता है वही रचना या कृति को समझ सकता है। यथार्थ की हमारी अपनी रचना और यथार्थ की पुलना संभव ही नहीं है क्योंकि उसी के द्वारा हम जान सकते हैं। जान डिवी ज्ञान को पर्यावरण के प्रति मनुष्य की अनुकूलनात्मक प्रक्रिया कहा है। स्वायत्तता और पहल के अवसर , उत्सुकता , गवेषणा , मुक्त प्रश्न का स्वागत , गतिशील और समग्र अनुभव वाला सीखना जिसमें सोच, संवाद और विचार का विस्तार होता हो अब महत्वपूर्ण हो चली है। सीखने और ज्ञान की रचना पर नये सिरे से गौर किया जा रहा है।
आज जब ‘समकालीनता ‘ स्वयं में एक अवधारणा का रूप ले चुकी है और उसके रंग में रंगा जाना मूल्यवान माना जा रहा है समकालीनता के प्रसंग में महात्मा गांधी पर विचार करना कोई महत्व नहीं रखता. समकालीनता में सब कुछ ‘इंस्टैंट’ होना चाहिए और इस तर्क से सब कुछ दूसरे ही क्षण पुराना पड़ता जाता है , जो उसकी नियति है, इसलिए व्यर्थ भी होता जाता है. अनवरत नए की तलाश के लिए जरूरी है पूर्व और पर विच्छिन्न हों ही. यह आज के इतिहासबद्ध जनों के लिए उपयोगी है. दूसरी ओर अनंत , सार्वकालिक , ब्रह्मांडीय स्तर पर जो सोच पाते हैं या सोचते रहे हैं उनको पुराने पड़ने का भय और नए की सतत खोज का संकट कम होता है. रैखिक ( लीनियर) के बदले काल की चक्रीय किस्म की सोच में जन्म-स्थिति-संहार का क्रम चलता ही रहता है. इसमेन पुराना नया और नया पुराना होता रहता है . यहां विच्छिन्नता का खतरा कम है. एक स्तर पर बदलाव का प्रयोग यहाँ भी है परंतु उसका भय या दबाव नहीं है. शकुंतला या सीता या फिर राम या कृष्ण के चरित वाल्मीकि , व्यास , कालिदास, भवभूति, भास, सूरदास, तुलसीदास, रसखान, तीजन बाई की पन्डवानी या रास लीला, राम लीला और तमाम कथावाचकों के बीच तरह तरह से नए होते रहते हैं पर विच्छिन्नता का खतरा नहीं होता है. वह विविधता बनाए रखने के लिए मानसिक औदार्य या ‘ स्पेस’ सुरक्षित है . वे सभी आख्यान भिन्न-भिन्न हो कर भी ग्राह्य होते हैं. इसलिए ज्यादातर भारतीय आदमी वर्तमान (सीमित) समय में रहते हुए भी समय से परे असीमित समय के बारे में बिना डरे सोच सकते हैं. उनकी विचार की कोटियों में (अस्पष्ट परंतु) व्यापक की , सारी मनुष्यता की , सारे जीवन के लिए भी जगह है. महात्मा गांधी भी विचार की कोटियों में व्यापक मनुष्यता के धरातल पर संचरण करते दिखते हैं. इसलिए उनका चिंतन समावेशी होकर अपने समय से भी आगे जाता है.
कुछ विज्ञ यह भी कहते हैं कि आजकल की समकालीनता और गांधी जी के विचारों के बीच बड़ी खाई है इसलिए उनके विचार अनुकूल नहीं हैं, हालांकि समय या काल स्वयं में कोई गुण या विशेषता नहीं रखता है. परंतु गांधी जी के विचार मनुष्य, जीवन, संस्कृति की उन सामान्य विशेषताओं या अनुभवों को लेकर चलते हैं जो एक तरह से सदा सदा के प्रश्न सरीखे हैं. अंत में यह भी दिखता है कि गांधी जी का अपना समकाल यानी उनके जीवन का देशकाल भी तो चुनौतीपूर्ण था शायद कुछ ज्यादा ही . गांधी तब भी प्रतिरोध कर रहे थे और आज भी वह वहीन ख्ड़े हैं. साथ ही तब मीडिया और संचार के वैसे प्रभावी उपाय भी न थे जैसे आज हैं. अत: विचारों की गुणवत्ता कहीं अधिक महत्वपूर्ण है . कहते हैं काल की गति कुटिल होती है यानी वह सीधी रेखा में नहीं चलता. पर थोड़ा रुकना पड़ेगा-जाता कौन है हम या काल? भर्तृहरि कहते हैं: कालो न यातो वयमेव याता: अत: हमें अपनी गति पर स्वयं ही विचार करना होगा, अपने जीवन की डोर खुद संभालनी होगी.
गांधी जी का बीज विचार ‘स्वराज‘ स्वावलम्बन और स्वतंत्रता के स्तम्भों पर टिका है. और इसकी उपलब्धि सतत साधना से आती है. इस बात को आगे बढाने के लिए मैं गांधी जी के तीन उद्धरणों की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा.
मनुष्य की वृत्तियां चंचल हैं . उसका मन बेकार की दौड़ धूप किया करता है. उसका शरीर जैसे -जैसे ज्यादा दिया जाए वैसे-वैसे ज्यादा मांगता है. ज्यादा लेकर भी वह सुखी नहीं होता . भोग भोगने से भोग की इच्छा बढती जाती है . इसलिए हमारे पुरुखों ने भोग की हद बांध दी . यह हद आज भी बांधे जाने की जरूरत है .
हिंद स्वराज पृ. 35
सभ्यता वह आचरण है , जिसमें आदमी अपना फर्ज अदा करता है, फर्ज अदा करने का अर्थ है , नीति का पालन करना . नीति के पालन का मतलब है अपने मन और इंद्रियों को बस में रखना. ऐसा करते हुए हम अपने को (अपने असली स्वरूप को) पहचानते हैं. यही सभ्यता है .
-हिंद स्वराज पृ., 52.
अंत में तो मनुष्य उतने का ही मालिक है न , जितने का वह प्रतिदिन उपयोग कर सकता है और जितने को वह पचा सकता है ? सब कोई ऐसा करे तो इस आकाश व्यापी जगत में सबके लिए स्थान रहे और किसी को तंगी का अनुभव ही न हो.
-आरोग्य की कुंजी पृ. 18
ये उद्धरण बड़े पुराने हैं . लगभग एक सदी पुराने तो हैं ही. अब समकालीन समय यानी 21वीं सदी के दूसरे दशक की समाप्ति की वेला में अपनी स्थिति पर गौर किया जाय. आज लगभग सारी पृथ्वी न केवल जलवायु के भीषण परिवर्तन से गुजर रही है , जिसकी चेतावनी प्राकृतिक विपदाओं द्वारा बार-बार मिल रही है; बल्कि उस पर रहनेवालों के बीच का रिश्ता भरोसे की कमी, हिंसा और अपरिमित लोभ और लिप्सा से भी ओतप्रोत हो रहा है. महात्मा गांधी के जन्म के डेढ सौ साल बाद का आज का यह समय मनुष्य द्वारा ही जनी गई ऐसी चुनौतियों से हमें रूबरू करा रहा है जिसके आगे मानवता वह स्वयं को निरुपाय सी महसूस कर रही है. उसका विश्वास अपने आत्मबल में न हो कर तकनालजी में ज्यादा है परंतु सवालों के ठीक-ठीक जवाब नहीं मिल पा रहे हैं. शायद उत्तरों की हमारी खोज ही गलत दिशा में और गलत जगह पर हो रही है. ऐसे में कोई राहत दूर-दूर तक दृष्टि में नजर नहीं आ रही है. हां, इस बीच कुछ भ्रम जरूर पनपते रहे हैं और उनके चलते हम बीच-बीच में चमत्कृत भी हो लेते हैं. पर शीघ्र ही बात वापस अपनी पुरानी जगह पहुंच कर ठहर जाती है. ऐसे में गांधी का स्मरण ठंडी बयार का झोंका सा लगता है जो मनुष्यता के घावों को सहलाता है और यह गुनने और समझने के लिए प्रेरित भी करता है कि इस तेज रोशनी वाले अंधेरे सुरंगी माहौल में कुछ मार्ग तलाशे जा सकते हैं और मनुष्यता की ओर वापसी असंभव नहीं है. ऊपर बापू के कुछ विचार उद्धृत किए गए थे जो इस दृष्टि से सोचने के लिए मार्गदर्शक जैसे हैं.
सोचने और करने की गुंजाइश अब भी की बाकी है क्योंकि सारे विकास के ताम-झाम के बावजूद मनुष्य की रोजमर्रे की जिंदगी के सरोकार एक हद तक और मूल रूप से सार्वकालिक और सार्वभौमिक जैसे ही हैं. महाभारत बीता इतिहास नहीं है, वह हर एक की जिंदगी में रोज लड़ा जा रहा है और उसके पात्र हम सब अपने इर्द-गिर्द देखते पाते रहते हैं. मसलन भूख प्यास,निद्रा,सेक्स जैसी शारीरिक जरूरतें सबकी हैं. और जीवन चलाने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान का इंतजाम तो सबको करना ही होता है. पर चिंतन की क्षमता वाला मनुष्य यहीं ठहर नहीं जाता है. वह निजी शारीरिक जरूरतों से आगे बढ कर समाज, ज्ञान, विज्ञान,साहित्य और आध्यात्म की ओर भी बढता है. शरीर को वह इन सबका साधन बनाता है न कि प्रतिगामी विचार के अधीन हो कर आगे न बढ कर शरीर की परिधि ( अन्नमय कोश) के बाद के विकास को शरीर की ओर ही उन्मुख करता है. आज आधुनिक मनुष्य के तथाकथित विकास का बहुत बड़ा हिस्सा उसके अपने निजी शरीर के उत्सव मनाने से जुड़ता जा रहा है और उदात्त प्रकृति के व्यापक सरोकार दिन-प्रतिदिन सिमटते-सिकुड़ते जा रहे हैं. आज के तनाव, संघर्ष, उल्लास, हर्ष का दायरा ‘लोक’ और ‘सर्व’ से हट कर ‘अहं’ और ‘मम’ तक सिमट रहा है (या फैल रहा है !). वह ‘ वयं’ के साथ तदाकार नहीं हो पा रहा है. जो भी अहं से परे है वह मनुष्य के लिए गौड़ होता जा रहा है. वह आखों से ओझल है, वह सुहाता नहीं है . फलत: दिखता ही नहीं है. अपने लिए किसी तरह की प्रतिबंध और संयम की सीख बड़ी बुरी लगती है क्योंकि दृश्यमान जगत में पाने को बहुत कुछ शेष दिखता है. उसको पाना और इकठ्ठा करते चलना ही भौतिक सभ्यता का सूत्र बन गया है जो विनाशकारी होने पर भी अंधी दौड़ के दौरान दिखता नहीं है . और दौड़ के अंत में उसके देख पाने और उससे कुछ सीखने के लिए कोई लाभ नहीं होता है. इस दौरान ‘संयम’, ‘अपरिग्रह’ और ‘संतोष’ जैसे शब्द व्यक्तित्व-विकास के लिए बाधक और विरोधी मान लिए गए हैं. परंतु क्या यही सच है? क्या यही श्रेयस्कर है ? किंचित विराम ले कर इन प्रश्नों पर विचार की आवश्यकता है.
‘हिंद स्वराज’ में गांधी जी ने 1909 में जो तजबीज कर भविष्य्वाणी की वह आज सही साबित हो रही है :
शरीर को सुख कैसे मिले, यही आज की सभ्यता ढूढती है , और यही देने की कोशिश करती है . परंतु वह सुख भी नहीं मिल पाता. यह सभ्यता तो अधर्म है. यह सभ्यता ऐसी है कि अगर हम धीरज धर कर बैठे रर्हेंगे , तो सभ्यता की चपेट में आए हुए लोग खुद की जलाई हुई आग में जल मरेंगे . पैगम्बर मुहम्मद साहब की सीख के मुताबिक यह शैतानी सभ्यता है . हिंदू धर्म उसे निरा ‘कलजुग’ कहता है. यह सभ्यता दूसरों का नाश करने वाली और खुद भी नाशवान है ‘ ( पृ. 40 )
आज प्रगति और उन्नति के दौर में मनुष्य की पीड़ा के नए -नए श्रोत पैदा हो रहे हैं. भौतिक संसाधनों का जिस तरह अंधाधुंध दोहन हो रहा है, प्रतिस्पर्धा और आक्रोश को मूल्यवान बनाया जा रहा है उससे आम आदमी का जीवन दूभर होता जा रहा है. अपरिग्रह और अस्तेय की जगह, इकट्ठा करो और छीनो-झपटो के सिद्धांत पर अमल करने वाली प्रवृत्ति बलवती हो रही है. इसे अपनाने के कारण आर्थिक भ्रष्टाचार और अपराध भी बढ रहे हैं. साथ ही सामाजिक समरसता और सौहार्द की कमी भी हो रही है. यह एक दुखद स्थिति है जिसका समाधान ढूंढना जरूरी है ताकि हिंसा तथा रक्तपात की रोकथाम हो सके और उससे बचा जा सके. महात्मा गांधी ने इस अवस्था से निपटने का एक मार्ग सुझाया था जो संयम के नियम पर आधृत था.
महात्मा गांधी ने इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका और भारत,में निजी और सामुदायिक अनुभवों के आलोक में जिन जीवन-सूत्रों को पहचाना और जिन पर अमल करने के लिए अपने को समर्पित किया उनमें वाणी, आचार और व्यवहार में संयम बनाए रखने को विशेष महत्व मिला. ‘हिंद स्वराज’ में उनके द्वारा भारत के सामने जिस पश्चिमी सभ्यता की चुनौतियों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया उसमें भी उपभोग का खंडन करते हुए संयम को ही अनेकश: प्रतिष्ठित किया गया. गांधी जी मानते हैं कि ’ व्यक्ति की नैतिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए शारीरिक और सांस्कृतिक सुविधाओं की एक सीमा तक आवश्यकता है. व्यक्ति को इससे आगे नहीं जाना चाहिए. क्योंकि आवश्यकताओं की वृद्धि से व्यक्ति की विलासिता बढेगी और इससे उसके विकास के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न होंगी (हरिजन,1936 पृ. 226) . वे कहते हैं कि ‘ मैं यह नहीं मानता कि इच्छाओं को बढाने या उनकी पूर्ति के साधन जुटाने से संसार अपने लक्ष्य की ओर एक कदम भी बढा पाएगा’’. (यंग इंडिया , 1927 )
स्वयं के जीवन के मंत्र के रूप में में भी गांधी जी ने संयम का व्यापक और सतत प्रयोग किया. उन्होंने दृढतापूर्वक मन, वचन और कर्म में संयम का भाव अंगीकार कर आत्मसात किया. ईशावास्य उपनिषद की सीख ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा: मा गृध: कस्यस्विद धनं’ और श्रीमद्भगवद्गीता का ‘स्थितप्रज्ञ’ का आदर्श सदैव उनके सम्मुख स्थापित था और उस दिशा में वे चलते रहे. उनके ऊपर गीता का निम्नलिखित वचन खूब फबता है:
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेंद्रिय:
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते
( गीता, 5 / 7)
अर्थात जो योगयुक्त हो गया , जिसका अन्त:करण विशुद्ध हो गया , अपने मन को और इंद्रियों को जिसने जीत लिया , और सब प्राणियों की आत्मा जिसकी अपनी आत्मा बन गई , वह कर्म करता हुआ भी (उनके पुण्य और पाप से) अलिप्त ही रहता है.
वस्तुत: संयम का आचरण व्यक्ति को नियमित-नियंत्रित करता है और उससे अन्य व्यक्तियों और समुदाय को अवसर मिलता है. महात्मा गांधी ने अपने जीवन में संयम को कई रूपों में अपनाया. वे कहते हैं ‘ जो भी व्यक्ति ईश्वर के रूप में सत्य की व्यक्तिगत खोज करना चाहते हैं , उन्हें पहले कई व्रतों का पालन करना चाहिए . उदाहरणार्थ सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि. ब्रह्मचर्य द्वारा कामों अर्थात वासनाओं एवं भावनाओं पर नियंत्रण प्राप्त किया जाता है, अहिंसा द्वारा राग, द्वेष, क्रोध पर विजय प्रप्त की जाती है, अपरिग्रह द्वारा संग्रह की प्रवृत्ति का त्याग होता है. चोरी न करना अर्थात ईमानदार व्यक्ति को ईश्वर की प्राप्ति होती है, सत्य का पालन इनके लिए है. इन शर्तों का जो व्यक्ति पालन करत है वह सत्य का साक्षात्कार कर सकता है अन्यथा उससे वंचित रह सकता है. पांचों व्रत सभी शास्त्रों के सभी धर्मों के केंद्रविंदु हैं . कोई भी शास्त्र और धर्म ऐसा नहीं है , जो कि इन पांचों व्रतों से शून्य हो. इसलिए यह आवश्यक है कि सत्य और अहिंसा के विपरीत जो भी वस्तु शास्त्रों में मिले उसका वह परित्याग कर दे. क्योंकि सत्य और अहिंसा ही समस्त धर्म के आधार स्तम्भ हैं ‘ (हरिजन सेवक, 6.4. 1934)
संयम का व्यावहारिक पक्ष
महात्मा गांधी के जीवन का अवलोकन करने पर संयम के निम्नलिखित व्यावहारिक पक्षों की ओर ध्यान जाता है:
ये सभी कर्म योगी महात्मा गांधी के संयम के मूल सूत्र की ही व्याख्या लगते हैं. पतंजलि के अष्टांग योग का प्रथम अंग यम है जो सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य को स्थापित करता है जो गांधी जी के दर्शन को रूपायित करते हैं. अपने आश्रम के रहवासियों से भी गांधी जी की यही अपेक्षा रहती थी कि वे इनका पालन करें. अहमदाबाद में 1915 में सत्याग्रह आश्रम के लिए ग्यारह व्रत नियत किये गये थे : सत्य, अहिंसा या प्रेम, ब्रह्मचर्य, जीभ पर नियंत्रण, चोरी न करना, अनावश्यक वस्तुओं को एकत्र न करना, शारीरिक श्रम, स्वदेशी अपनाना, अभय, अस्पृश्यता निवारण, तथा सहिष्णुता . इनका उद्देश्य था देश सेवा जो सार्वभौमिक कल्याण के साथ सुसंगत हो. यह अकारण नहीं है कि गांधी जी के तीन प्रसिद्ध बंदर भी आंख, कान और मुंह पर संयम की ही सीख देते हैं. आज हम जिस माया जाल में फंसते जा रहे हैं उसमें संयम के स्थान पर लोभवश संग्रह, यहां तक कि व्यर्थ और अनुपयोगी सामग्री के संग्रह की वृत्ति बढती जा रही है. दूसरों की देखा-देखी और विज्ञापनों के वशीभूत हम अपनी जरूरतों के विषय में बिना किसी विवेक या औचित्य के असंयमित भाव से उपभोग वृत्ति में निमग्न होते जा रहे हैं. संयम मानवीय ऊर्जा के संधान का उपाय है. प्रकृति अपरिमित रूप से अनंतकाल तक धन-धान्य से हमें परिपूर्ण नहीं रखेगी . यह धरती और पर्यावरण रहे और वहां पर जीवन बचा रहे इसके लिए संयम ही एकमात्र मार्ग है. इस मूल्य का स्वीकार करते हुए ही अपनी पारिस्थितिकी के साथ संतुलन बन सकेगा और सारी सृष्टि जीवंत हो सकेगी. इसके लिए व्यापक और गहरा आत्ममंथन जरूरी होगा. हम बाहर की दुनिया में इस कदर खोते जा रहे हैं कि अपने आपको ही भूलते जा रहे हैं. अत: अन्त:करण द्वारा परिष्कार करने से ही हम अपनी चेतना को पुन: समझ सकेंगे और व्यापक अस्तित्व से जुड़ सकेंगे. शिक्षा में इसका अवसर जितना बन सके उतना ही लाभकर होगा. गांधी जी के विचार जीवन और जगत के मूलभूत प्रश्नों को आज भी छेड़ते हैं और सोचने की दिशा भी देते हैं .
यह सिर्फ संयोग की बात नहीं है कि अंग्रेजी राज के दौर में जिस समय 1929 में लाहौर में कांग्रेस द्वारा ‘पूर्ण स्वराज्य’ का प्रस्ताव पारित किया जा रहा था उसी समय कलकत्ता में हुगली कालेज में प्रसिद्ध दार्शनिक प्रोफेसर कृष्ण चंद्र भट्टाचार्य भारत में “विचारों में स्वराज” लाने की जरूरत का प्रतिपादन कर रहे थे. वे अंग्रेजों द्वारा स्थापित शिक्षा के अंतर्गत तेजी से पनप रही भारत की सांस्कृतिक गुलामी से मुक्ति के लिए आवाहन कर रहे थे. उनके अनुसार विचारों और भावों की दुनिया में एक नई और कदाचित असंगत सोच भारतीयों पर लादी जा रही थी. उन्ह्ने लग रहा था कि राजनीति के स्तर पर दूसरे पर अधिकार की बात प्रकट रूप से दिखाई पड़ती है और स्पष्ट दिखने से उसका प्रतिकार करना आवश्यक प्रतीत होता है. यद्यपि इसका भी प्रभाव अंदर तक भिन जाता है पर जिस तरह भिन्न विदेशी (एलियन) विचारों का प्रभुत्व विचारों के स्तर पर हाबी होता है वह प्रच्छन्न यानी छिपा होता है पर वह अचेतन में पहुंच कर गहरे असर करता है. नियति की विडम्बना यह कि भारत के तत्कालीन भद्र लोक ने शायद स्वयं को पिछड़े होने की चिंता में इस आयातित सोच को चाहा भी और अच्छा भी माना. भट्टाचार्य का मानना था कि इसमें दी जा रही शिक्षा के अंतर्गत अपने विगत प्राचीन इतिहास, वर्तमान के यथार्थ और भविष्य के लक्ष्य के लिए कोई सृजनात्मक दृष्टि नहीं मिलती है. परिणाम यह हुआ कि भारत से या भारत के बारे में हमारा अज्ञान बढता गया और विदेश के साथ परिचय की वृद्धि हुई. भारत अनचीन्हा होता गया, इतना कि उसकी प्रामाणिक जानकारी के लिए हम पश्चिम की ओर रुख करने लगे. यह सब लार्ड मैकाले की अद्भुत शैक्षिक क्रांति की सफलता का परिणाम रहा. ज्ञान चाहे जहां का हो ज्ञान है और उस रूप में विचार्य है परंतु उसके साथ अनालोचित पर जुड़ा हुआ श्रेष्ठता का आग्रह और अपनी पहचान और अस्तित्व की हानि की अनदेखी कर दी गई. स्मरणीय है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी यही सोचा था कि विचारों की हवा आए जाए, खिड़की तो खुले पर खड़े रहने की जमीन अपनी ही रहे.
स्वतंत्रता मिलने के बाद उत्तर-उपनिवेश काल में ‘एक विश्व’ और फिर वैश्विकता का आग्रह फैशन की तरह प्रचलित हुआ. इसमें सांस्कृतिक बहुलता और सापेक्षता का जो मिश्रण हुआ उसमें स्वातंत्र्य और स्वायत्तता की जगह सांस्कृतिक अधीनता को बल मिला. यूरोपी विचार को सार्वभौम ठहराया गया . भारत के समाज, विचार संस्कृति के विषय में दूसरों के निर्णय को हम प्रामाणिक स्वीकार करने लगे. भारत के अपने सांचे पर एक भिन्न सांचा फिट कर दिया गया और उसके अनुसार देखने और विचार करने की जो आदत पड़ी उससे सांस्कृतिक विस्मरण की प्रक्रिया शुरू हुई और हम स्वयं से , अपनी ज्ञान और विचार की परम्परा से इतने दूर होते गए कि उसकी प्रासंगिकता पर बिना विचारे अस्वीकृत कर दिया और पूरी शिक्षा से बहिष्कृत कर दिया.यदि उसे स्वीकार किया तो वही जो पश्चिम के अनुकूल हो या वहां से अनुमोदित हो. हम भारत की आत्मा की पहचान नहीं कर सके. एक जरूरी आलोचक राष्ट्र का विकास होना था जो बाहरी (विदेशी) और भीतरी (देसी) दोनों ही व्याख्याओं की विवेकपूर्ण समीक्षा करता और आज की परिस्थिति में आकलन करते हुए उन्हे स्वीकार या अस्वीकार करता. आत्म नवीकरण के लिए तो ऐसा भारतीय आत्मबोध चाहिए जिसमें निरंतरता और परिवर्तन दोनो हों. बाह्य तत्वों का समुचित ग्रहण, उन्ह्ने आत्मसात करना और उनका परिष्कार तीनों की जरूरत है न कि उन्हे ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेना. अब हममें से कई इस परिस्ठिति को बाजार और वैश्विकता के आधार पर जरूरी ठहराते हैं. पर सब कुछ सिर्फ इसी के आधार पर नहीं समझा जा सकता.
राजनैतिक स्वतंत्रता मिलने पर भी वैचारिक स्वतंत्रता की दृष्टि से हम पीछे हैं. जब देश को स्वतंत्रता मिली तो 15 अगस्त 1947 को प्रधानमंत्री नेहरू ने अपने प्रसिद्ध भाषण में ‘देश की आत्मा की मुक्ति’ की घोषणा की थी. वे कह रहे थे कि ‘अब भारत स्वयं को खोज पा रहा है.’ वे देश से ‘ निर्धनता, अज्ञानता और अवसर की असमानता’ को मिटाना चाहते थे. उन्ह्ने लगा कि अब ‘भारत जागृत और स्वतंत्र’ है. बीते समय में हमारी बहुत सारी उपलब्धियां हुई हैं जिन पर हमें गर्व है. हमारा दम-खम बढा है और ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी प्रगति की दृष्टि से हम कई कदम आगे चले हैं. इस बीच परिस्थितियां भी बदली हैं और लोकतंत्र सुरक्षित है. तथापि सृजनात्मकता और वैचारिक सांस्कृतिक दृष्टि से हम कुछ संकुचित से हुए हैं और हम अपने नैसर्गिक परम्परागत स्वभाव के साथ अपने रिश्ते को लेकर एक हद तक अस्पष्ट भी हैं. राष्ट्र, देश, संस्कार और संस्कृति जैसे शब्दों में पिछड़ेपन की बू आती लगती है और बहुतेरे शिक्षित इनसे परहेज करना चाहते हैं.
रोचक बात यह है कि वैचारिक व्यापकता और उदार दृष्टि की कसौटी पर भारतीय विचार किसी से कमतर नहीं दिखते. यहां की सोच में अंतरानुशासनिकता बहुत दिनों से थी क्योंकि समग्र और सकल को ध्यान में रखना यहां की विश्व दृष्टि का हिस्सा था. सबके साथ संलग्नता मौजूद थी. शास्त्र , लोक और प्रयोग परस्पर जुड़े थे. हमने उससे अपने को जरूर काट लिया और अपने को अलग कर लिया. भट्टाचार्य ने कहा था कि वर्तमान व्यवस्था में हम पश्चिम की संस्कृति के तहत अपनी प्राचीन संस्कृति की ओर एक कुतूहल के साथ और इस मनोवृत्ति के साथ देखते हैं कि विदेशी प्राच्यविदों की क्या नजर है और तब यह लगता है कि हमारी प्राचीन संस्कृति में कुछ भी कौतूहल योग्य नहीं. हमारे बहुतेरे शिक्षित लोगों को हमारे देशज प्रकृति को न जानते हैं न जानने की परवाह करते हैं. जब वे जानना भी चाहते हैं तो उन्हे वैसा नहीं लगता , जैसा उन्ह्ने लगना चाहिए. अपने आत्म को पुन: खोजना चाहिए. हमने आंख खोल कर परंपरा और इतिहास को नहीं देखा . पूर्व पश्चिम का संवाद अपनी शर्तों पर हो और संश्लेषण होना चाहिए न कि आंख मूंद कर पश्चिम का अंगीकार. भट्टाचार्य विदेशी प्रभाव में भरतीय शिक्षा को ‘ जड़ हीन’ होता देख रहे थे. वे कहते हैं कि ‘ यहां के देशज ज्ञान और देश काल के अनुरूप समझ का विकास अधिक जरूरी है. हम जाति प्रथा का खंडन करते हैं परंतु यह भुला देते हैं कि पश्चिमी शिक्षा पाए हुए भारतीय लोग नई जाति बनाए हैं जो किसी परम्परागत जाति से अधिक असहिष्णु है और जो विचारों का बहिष्कार करती चलती है. इस जाति की बाधा को तोड़ कर भारतीयों को संस्कृति के निकट ला कर एक ऐसी संस्कृति के विकास की जरूरत है जो देशज प्रतिभा और काल के उपयुक्त हो.
वस्तुत: औपनिवेशिक विरासत और वैश्विकता के बीच ‘विचारों में स्वराज ‘ खोता गया. ‘संस्कृति‘ मूलत: हमारी रचनात्मकता क्षमता की उपलब्धि होती है और उसके विकास यात्रा को रेखांकित करती है. सांस्कृतिक उपलब्धि संचित होती रहती है, बदलती भी है और पीढी दर पीढी आगे हस्तांतरित होती चलती है. ज्ञान, कौशल, विचार, हुनर, और सभी प्रकार की कलाओं आदि सभी का विस्तार इसी तरह होता है. संस्कृति गतिशील प्रक्रिया है और इसमें सब की भागीदारी और साझेदारी होती है. इस काम में भाषा और संवाद प्रमुख आधार होता है. यदि सम्प्रेषण और संचार के साथ ही संस्कृति की धारा प्रवाहित होती है. भाषा में निहित विचारों और सम्प्रत्ययों की श्रेणी के सहारे हम दुनिया को देखते हैं. भारत की परम्परागत ज्ञान परम्परा में भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में व्यापक और विविध प्रकार के ज्ञान की साधना शामिल है. भारतीय संस्कृति इस अर्थ में भी व्यापक है कि उसमें हर कोने से विचारों को अपनाने और स्वागत करने पर बल है : आनो भद्रा: क्रतवो यंतु विश्वत : . ऐसे ही कहा गया कि सत्य तो एक है पर विद्वान लोग उसे कई दृष्टियों से देखते हैं: एकं सत विप्रा: बहुधा वदंति . यह भी सोचा गया कि व्यक्ति और समष्टि , पिंड और ब्रह्मांड दोनों में निकटता और समानांतर प्रवाह है : यत्पिंडे तद ब्रह्मांडे. वेद के प्रसिद्ध शांति पाठ में जल, पृथ्वी, वनस्पति आदि सब पर ध्यान दिया गया. सब की शांति चाहिए . सभी को एक दूसरे के साथ सुशोभित होना चाहिए. ऐसे ही साथ चलने और विचारों को साझा करने पर भी बल दिया गया और ‘ वसुधैव कुटुम्बकम्’ कह कर सारी धरती को और सब लोगों को साथ लेकर उदारता की परिकल्पना की गई. इस सबके पीछे दूसरों के हित की बात थी. भारतीय संस्कृति उदारता और बंधुत्व पर बल देती है. इस विरासत के आलोक में हम अपने को समृद्ध पाते हैं और इससे जुड़ कर स्वतंत्र और स्वायत्त सोच यानी विचारों में स्वराज की दिशा भी देख पाते हैं.
चूँकि भाषा स्वभाव से ही अनिवार्य रूप से एक सामाजिक उत्पाद है इसलिए भौगोलिक और सांस्कृतिक परिवेश में परिवर्तन के समानांतर भाषा के रूप भी बदलते जाते हैं। प्रत्येक भाषा अनिवार्यतया संस्कृति में ही पलती-बढ़ती है और सामाजिक संवाद और संचार के उपक्रम में ही उसका जन्म और विकास होता है। इसके साथ ही यह तथ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि भाषा संस्कृति के निर्माण में भी सक्रिय योगदान देती है। जहाँ तक ‘हिंदी’ का प्रश्न है यह उल्लेखनीय है कि ‘हिंद’ शब्द ‘सिंधु’ का ही विकसित रूप है। अवेस्ता में ‘हेंदु’ और पुरानी पहलवी में ‘हिंद’, ‘हिंदूक’ और ‘हिंदुश’ का प्रयोग मिलता है। ऐसे ही मध्यकालीन ईरानी भाषा में ‘हिन्दिक’ का प्रयोग दिखता है। कदाचित यही ‘हिन्दिक’ ही हिंदी का मूल है ।आरम्भ से ही ‘हिंदी’ एक देशवाची शब्द रहा है। ‘ज़बाने हिंदी’ का उपयोग हिंद क्षेत्र की भाषा को इंगित करने के लिए किया गया और संस्कृत भाषा की प्रसिद्ध रचना ‘पंच तंत्र’ को ज़बाने हिंदी की पुस्तक कहा गया । तुलसी और कबीर आदि ने हिंदी नहीं बल्कि ‘भाषा’ का प्रयोग किया। अमीर खुसरो और बाद में अबुल फ़ज़ल ने जो भाषाओं की गणना की उसमें भी हिंदी जैसी किसी स्वतंत्र भाषा का नाम नहीं मिलता है। सत्रहवीं सदी आते-आते ‘हिंदी’ और ‘हिंदवी’ समानार्थक हो चले थे और मध्य देश की भाषा का बोध कराते थे। दक्षिण में बीजापुर और गोलकुंडा में प्रयुक्त हिंदी खड़ी बोली थी। दक्षिण में ‘दक्ख़िनी हिंदी’ और ‘हिंदवी’ का प्रयोग हुआ जो फ़ारसी लिपि में लिखी जाती थी। इस तरह ‘हिंदी’ भारत के देश वासियों द्वारा प्रयुक्त भाषा के लिए प्रयुक्त हुआ। हिंदी हिंद की भाषा और हिंदवी हिंदुस्तानियों की भाषा हो गई । ईस्ट इंडिया कम्पिनी ने ‘हिंदुस्तानी’ शब्द का प्रयोग उचित समझा। यह रेखता या उर्दू के समानार्थक भाषा थी। सन 1800 में फ़ोर्ट विलियम कालेज में गिलक्राइस्ट ने हिंदुस्तानी भाषा के अध्ययन की परम्परा का श्रीगणेश किया। वे हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी को समानार्थी ही मानते थे। इशा अल्ला ख़ान ने हिंदी का उपयोग मध्य देश की भाषा को व्यक्त करने के लिए किया। भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से यह मत स्थिर हुआ है कि पश्चिमी हिंदी शौरसेनी अपभ्रंश भाषा से; पूर्वी हिंदी अर्धमागधी से ; पहाड़ी नागर अपभ्रंश से तथा बिहारी मागधी अपभ्रंश से विकसित हुईं ।
भाषा संस्कृति की संवाहिका होती है। हिंदी के विषय में यह बात और ज़्यादा सही और सटीक ठहरती है क्योंकि यह अन्य भाषाओं की तरह टिक कर किसी एक स्थान या क्षेत्र में सीमित या बंधी नहीं रही। इसका विस्तार भारत के अनेक भागों में और प्रवासी भारतीयों के साथ विदेश में भी हुआ। अतः भौगोलिक उपस्थिति की दृष्टि से हिंदी का विस्तार-क्षेत्र संस्कृत भाषा को छोड़ कर किसी भी अन्य भारतीय भाषा की तुलना में अत्यंत व्यापक है। हिंदी ने उन भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के सांस्कृतिक जीवन में स्पंदन का संचार किया और उन विभिन्न क्षेत्रों स्वयं में ढलती गई। आज भाषा के अध्येतागण क़रीब पचास तरह की हिंदी का उल्लेख करते हैं जो भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में प्रयुक्त होती है।
हिंदी के विविध रूप
हिमाचल की तराई से लेकर दक्षिण में नर्मदा तथा बिंध्य पर्वत श्रेणियाँ, पंजाब, सिंध और गुजरात, बंगाल और छोटा नागपुर के बीच के क्षेत्र को प्रायः हिंदी-क्षेत्र की परिधि में रखा जाता है। यहाँ शिक्षा, साहित्य और पत्रकारिता की भाषा प्रमुखता से हिंदी है। मूलतः आर्य भाषा परिवार से आने वाली हिंदी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा आदि प्रदेशों में प्रमुख रूप से जन भाषा के रूप में बोली जाती है। बोल चाल में हिंदी के अनेक रूप मिलते हैं जिनमें अवधी , भोजपुरी, बुंदेली, कन्नौजी, हरियाणवी, छत्तीसगढ़ी, बघेलि, मगही, गढ़वाली, मैथिली, निमादड़ी, कुमायूनी ब्रज, खादी बोली, मालवी, मारवाड़ी और मेवाती प्रमुख रूप से आते हैं।इन्हें उपभाषाएँ/जन भाषाएँ कहा जाता है। यहाँ पर हिंदी क्षेत्र की सीमाओं को स्पर्श करती हुई भाषाओं का भी उल्लेख करना ठीक होगा। हिंदी क्षेत्र के पूर्व में बांग्ला और उड़िया, दक्षिण में तेलुगु और मराठी, उत्तर में नेपाली, और पश्चिम में पंजाबी, गुजराती और सिन्धी भाषाएँ आती हैं।
हिंदी क्षेत्र का देश की संस्कृति में उल्लेखनीय योगदान है। यहीं गंगा यमुना बहती हैं, राम और कृष्ण की लीला का स्थान भी यहीं है, भगवान विश्वनाथ यहीं विराजते हैं, राजस्थान की वीरता की कथा, सूर, कबीर, तुलसी, विद्यापति, मीरा, और जायसी की रचनाएँ यहीं हुई हैं। अमीर खुसरो, रहीम और रसखान भी यहीं हुए हैं। गुरु नानक की वाणी भी हिंदीमय है। संगीत की पूरी परम्परा हिंदी से अनुप्राणित है।
यह मानना अधिक उचित है कि हिंदी एक भाषा नहीं अपितु एक भाषा समष्टि को इंगित करती है। चूँकि भाषा का मूल रूप मौखिक है वह एक वाक़व्यापर है अतः उसमें परिवर्तन स्वाभाविक है जो वह देश और काल से अनुबंधित होता है। जिसे हम ‘बोली’ कहते हैं उसमें बड़ी विविधता मिलती है। पूरा हिंदी क्षेत्र हज़ार मील से ज्यादे विस्तृत है और उसमें क्षेत्रीय भेद स्वाभाविक रूप से मिलते हैं। ऐसे में कई भाषाएँ मौखिक और लोक प्रचलित हैं तो कुछ में परिपक्व और स्तरीय साहित्य रचना भी प्राप्त होती है। इस तरह ग्रामीण रूप से ऊपर उठ कर मारवाड़ी/राजस्थानी, ब्रज, अवधी, मैथिली, बुंदेली, मगही, छत्तीसगढ़ी और खड़ी बोलियाँ साहित्यिक दृष्टि से अधिक सम्पन्न हो चली हैं। आज खड़ी बोली हिंदी इन सब में अग्रगण्य हो चली हैं । उल्लेखनीय है कि सुदूर मध्य दक्षिण में बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुंडा में दक्ख़िनी, दकिनी या दख़िनी हिंदी का रूप मिलता है जिसे हिंदी या हिंदवी कहा गया था। यह दक्षिण की किसी भी भाषा के निकट नहीं है। राजकीय संरक्षण से इसे बड़ा बल मिला था । आज विभिन्न बोलियों उपभाषाओं के बीच राजनैतिक प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है। राजस्थानी और मैथिली के साथ भोजपुरी भी अपने को स्वतंत्र भाषा के रूप में परिगणित होना चाहती हैं। हिंदी के समष्टिगत रूप को ध्यान में रखने से हिंदी की शक्ति बढ़ती है।
हिंदी का विस्तृत क्षेत्र
उल्लेखनीय है कि आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, जम्मू कश्मीर, मणिपुर, पंजाब, बंगाल, अंडमान व निकोबार द्वीप समूह, अरुणाचल प्रदेश, लक्ष द्वीप, और मिज़ोरम में हिंदी बोलने वाले दूसरे स्थान पर हैं। नागालैंड, सिक्किम और चंडीगढ़ में भी अच्छी संख्या में हिन्दीभाषी हैं। महाराष्ट्र, उड़ीसा , दादरा और नगर हवेली में भी काफ़ी हिंदी भाषी बसते हैं। यह ज़रूर है कि जहाँ हिंदी क्षेत्रों में वे अधिकांशतः वे गाँव में रहते हैं हिंदी क्षेत्र के बाहर हिंदी शहरों में अधिक प्रयुक्त होती है।
वस्तुतः भाषा का लोकाधार महत्वपूर्ण होता है और भारत के लोग विदेश में भी हिंदी का प्रयोग करते हैं । भारत के बाहर पाकिस्तान, बांग्ला देश, बर्मा /म्यांमार और इंग्लैंड में बसे बहु प्रवासी भारतीय हिंदी का उपयोग करते हैं। फ़ीजी, मारिशास, सूरीनाम, त्रिनिदाद, गयाना और दक्षिण अफ़्रीका में भी हिंदी भाषी बसते हैं। नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और श्री लंका में भी हिंदी जानने और बोलने वाले हैं। रोज़गार और व्यापार की तलाश में अमेरिका, जर्मनी, खाड़ी के देशों में भी हिंदी भाषी पहुँच चुके हैं। वस्तुतः अब हिंदी किसी क्षेत्र विशेष की सीमा से नहीं बंधी है।
हिंदी भारतीय राष्ट्रभाषा हो इस पर बहस जारी है और शायद आगे भी जारी रहेगी परंतु हिंदी का राष्ट्र के लिए अवदान अविस्मरणीय है। भारत के स्वाधीनता संग्राम में हिंदी का विशेष योगदान रहा है। तब अनेकानेक अहिंदी भाषी जनों ने हिंदी को अपनाया था। हिंदी का राष्ट्रीय स्वरूप दयानंद सरस्वती, राजा राम मोहन राय, सुभाष बाबू, केशव चंद्र सेन, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी प्रभृति महानुभावों के योगदान से समृद्ध है।इन सबने समाज से जुड़ने और जोड़ने में हिंदी का उपयोग किया। यही नहीं पंजाब के गुरु नानक, महाराष्ट्र के नामदेव, संत ज्ञानेश्वर, गुजरात के नरसी मेहता, आसाम के शंकर देव, बंगाल के महाप्रभु चैतन्य आदि संतों की वाणी का रस हिंदी में प्रवाहित हुआ।
संस्कृति की दृष्टि से हिंदी का अवदान अनेक क्षेत्रों में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में प्राप्त होता है। हमारे द्वारा प्रयुक्त शब्द अनुभव के सार -संक्षेप हुआ करते हैं। अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में हिंदी ने बड़ी लम्बी दूरी तय की है। हिंदी के प्रचार प्रसार में फ़िल्मों ने एक अनुकूल वातावरण बनाने में विशेष भूमिका निभाई है। वह सहजता से बोधगम्य और प्रभावी है। हिंदी फ़िल्मों में काम करने के लिए अन्य भाषाओं से लोग आ रहे हैं । हिंदी सिनेमा बड़ा ही लोकप्रिय हो रहा है।आज हिंदी को जानने, समझने और बोलने वाले लोग देश में चारों ओर मिलेंगे। हिंदी में भाव प्रकट करना और दूसरों के भावों को समझना सरल है। वह चेतना का भी निर्माण करती है और संस्कृति की पहचान भी बनती है। अंग्रेज़ी वर्चस्व के शिकार होने पके बावजूद भी जन संचार माध्यमों, टेली विजन और मीडिया में हिंदी की उपस्थिति बढ़ रही है।भाषा से ही संवाद प्रेषित होता है। मुद्रित, श्रव्य और दृश्य हर माध्यम में हिंदी शक्तिशाली हो रही है। यदि स्वराज जनता का है तो हिंदी ही राज भाषा है। भारतीय एकात्मता के लिए वह एक सेतु है।
भारतीय संविधान की संकल्पना थी कि हिंदी का विकास इस तरह हो की वह भारत की सामसिक संस्कृति के तत्वों को ग्रहण कर जैन जैन की अभिव्यक्ति का माध्यम बने। आज भारत की तमाम भाषाओं का साहित्य हिंदी में अनूदित हो कर व्यापक जन समुदाय तक पहुँच रहा है। व्यापार, मनोरंजन और कला के क्षेत्रों में हिंदी की उपस्थिति उल्लेखनीय है। वेब साइट, फ़िल्म और धारावाहिक सीरियल हिंदी में हैं। राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने के लिए कलाकार , रचनाकार या राजनीतिज्ञ के लिए हिंदी अपरिहार्य है। भारतीय समाज और संस्कृति की पहचान के निर्माण और संरक्षण के लिए हिंदी भाषा प्रमुख आधार है। राष्ट्र एक महत्तर लोक ही है। इसके निवासी जनों के आचार-विचार और रीति रिवाज की अभिव्यक्ति का माध्यम प्रमुखतया भाषा है।वह परम्परा में स्पंदित होती है।
अंत में यह रेखांकित करना ज़रूरी है कि हिंदी लोकमानस के अधिक निकट है और उसकी शक्ति वहाँ से आती है । आज भी ब्रतों , अनुष्ठानों , वाचिक कथाओं, लोक गीतों आदि में हिंदी पीढ़ी दर पीढ़ी संचरित हो रही है, निरक्षर या अनपढों के बीच भी। लोक नृत्य, लोकाभिनय में और जीवन में समाए संस्कारों, ऋतुओं, निराई, रोपनी, बुआ ई, आदि विभिन्न अवसरों के गीतों में हिंदी का एक लोक सजीव है। माटी की सोंधी गंध नौटंकी, राम लीला, आल्हा,ढोला, कज़री, बारह्मसा, फाग, बिरहा, पूरबी, चैता और स्वाँग जैसे लोक पर्वों और उत्सवों में जीवंत है।
मौलाना जलालुद्दीन रूमी की १०० ग़ज़लों का मूल फ़ारसी से हिन्दी अनुवाद ‘निःशब्द–नूपुर’ का प्रकाशन एक स्वागत योग्य घटना है। इस संकलन का प्रकाशन ईरान सरकार के आर्थिक सहयोग से महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा तथा राजकमल प्रकाशन, दिल्ली के संयुक्त तत्त्वावधान में किया गया है। इस पुस्तक की बड़ी विशेषता यह है कि इसके द्वारा रूमी सम्भवतः पहली बार सीधे फ़ारसी से हिन्दी में अनूदित हुए हैं। इस पुस्तक में पहले फ़ारसी ग़ज़लों का देवनागरी में लिप्यन्तरण प्रस्तुत किया गया है तदनन्तर उनका हिन्दी अनुवाद दिया गया है। अन्त में मूल ग़ज़लों को फ़ारसी लिपि में भी रखा गया है। पुस्तक के अन्त में दिये गये महत्त्वपूर्ण परिशिष्टों में फ़ारसी काव्य भाषा को समझने के महत्त्वपूर्ण उपकरण जुटाए गए हैं। इसमें ग़ज़लों में प्रयुक्त सभी छन्दों को ईरानी तथा भारतीय काव्यशास्त्रीय रीति से गणनिर्देश पूर्वक समझाया गया है, क्लासिकल फ़ारसी कविता के लिए आवश्यक संक्षिप्त फ़ारसी व्याकरण जोड़ा गया है तथा प्रत्येक शब्द का अर्थ भी दिया गया है। इस प्रकार अनुवाद मात्र न होकर प्रस्तुत पुस्तक रूमी–रीडर के तौर पर काम कर सकने योग्य है।
रूमी सम्पूर्ण विश्व में अपनी आध्यात्मिक कविता मसनवी के कारण अत्यधिक प्रसिद्ध हैं। उनकी ग़ज़लें मसनवी की अपेक्षा कम प्रसिद्ध हैं। रूमी की दीवाने शम्स में संकलित ग़ज़लें ऊर्जस्वी काव्य के दुर्लभ उदाहरणों में से हैं। रूमी की ग़ज़लें सामान्य कविताओं की तुलना में भिन्न क़िस्म की हैं। इनके प्रत्येक ग़ज़ल का प्रत्येक शे,र अनुभूति की परिपूर्णता से उच्छलित है। रूमी प्रेम से आपादमस्तक भरने के बाद ही उन्होंने कविताएँ लिखनी शुरू की थी। उनकी कविता मात्र काव्यात्मक चमत्कारों को प्रदर्शित कर रसिकों को लुब्ध करने तक पर्यवसित नहीं होती, वह हृदय से निकल कर मस्तिष्क और हृदय को भिगोती हुई आत्मा तक का स्पर्श कर लेती है। सामान्यतः कवियों की पहुँच केवल कविताओं तक ही होती है, वे कविताओं को साध्य मानते हैं। परन्तु रूमी के पास कुछ ऐसी वस्तु भी है जिसके आगे उन्हें अपनी कविताएँ गौण लगती हैं। जब वे कोई ग़ज़ल शुरू करते हैं तो उस रस सागर से निकले हुए होते हैं, और ग़ज़ल के समाप्त होते–होते वे फिर उसी की याद में विह्वल होने लगते हैं। यही कारण है कि उनकी लगभग अधिकांश ग़ज़लों के अन्त में ख़ामोशी और चुप रहने की नसीहत का भाव ज़रूर दिखाई पड़ता है। उनकी उच्चकोटि की रसप्लुत कविता भी उन्हें महाभाव की निरन्तरता में कुछ क्षणों का बाधक ही बनती है। इस प्रेम की परम स्थिति में नख से सिख तक डूबे रूमी जब इहलोक तक वहाँ की कुछ भी ख़बर ले आते हैं तो वह हमारे लिए आश्चर्यकारी ही होता है। अनुभूतियों की यह अपरिचित विलक्षणता हमें किसी दूसरे कवि के यहाँ नहीं मिल पाती। इसी कारण रूमी के बारे में प्रचलित है कि वे शाइर नहीं साहिर (जादूगर) हैं।इसलिए इनकी कविताएँ साहित्यिक उपलब्धि के साथ–साथ आध्यात्मिक साधना की सामग्री भी हैं। वे व्यक्तित्व के परतों को खोलती हैं। उनकी समस्याओं को पहचानती हैं। उनका इलाज सुझाती हैं, और यदि उनका निरन्तर मनन किया जाए तो वे हमारा अन्तस भी परिवर्तित करती हैं।
रूमी द्वारा प्रवर्तित सूफ़ियों के मौलवी सम्प्रदाय ने समा अर्थात् आध्यात्मिक नृत्य को भी अपने सम्प्रदाय में सम्मिलित किया था। उनकी गजलें मुख्यतः दफ की थाप और नै (बाँसुरी) की लय पर गाने के लिये अथवा गाते नाचते हुए निकली हैं । इस कारण इन गजलों में जो ऊर्जा, जो प्रवाह, जो संगीतात्मकता अथवा जो लयात्मकता मिलती है वह अन्य किसी भी फ़ारसी कवि के यहाँ दुर्लभ हैं। इनके गजलों में आन्तरिक अन्त्यानुप्रास(=काफिये) प्रयोग प्रचुर है जिनसे कविता में अभूतपूर्व लयात्मकता आ जाती है। फ़ारसी में इन छन्दों को देखें तो बहुत ही सुन्दर तथा संगीतात्मक प्रतीत होती हैं जबकि उनका अनुवाद करने पर वह स्वभावतः नष्ट हो जाता है। प्रस्तुत संकलन में जान बूझ कर ऐसी गजलों को अनुवाद के लिये चुना गया है जो कथ्य प्रधान हैं तथा जिसमें सुन्दर तथा उच्च काव्यार्थ की व्यञ्जना है। अतः फ़ारसी के किसी अध्येता को यह संकलन रूमी का प्रतिनिधि संस्करण न लगे यह स्वाभाविक है। इसका प्रमुख कारण यह है कि यह संग्रह हिन्दी भाषी पाठकोंको रूमी से सीधे सीधे साक्षात्कार करने केलिये किया गया है।
संकलन का एक आधार भारतीय पाठक की काव्य–रुचि भी है। फ़ारसी कविता कीअनेक काव्य रूढियाँ या प्रचलन ऐसे भी हैं जो भारतीय मानस को विचलित कर सकती हैं। कारण यह है कि काव्य प्रयोग अथवा उपमानों में बहुत से भाषा–सापेक्ष होते हैं, जो दूसरी भाषा केलिए अजीब भी लग सकते हैं। ऐसी गजलों की प्रस्तुति से बचा गया है। अन्यथा रसनिष्पत्ति की अपेक्षा रसभंग की आशंका अधिक हो जाती। मौलाना की ग़ज़लों में कई शे,र ऐसे हैं जो सुन्दर और महत्त्वपूर्ण तो हैं, लेकिन उनमें कई कई अन्तःकथाएँ, मिथक तथा ऐतिहासिक संकेत भी मौजूद हैं, जिनको जाने बिना उन शे,रों को नहीं समझा जा सकता। प्रक्रिया गौरव की आशंका से बचने के लिए ऐसे श,रों को प्रस्तुत संग्रह में कम से कम ग्रहण किया गया है।
प्रस्तुत संग्रह को तैयार करने के लिए अनुवादक द्वारा कई तरह के प्रामाणिक तथा मूल फ़ारसी स्रोतों से सहस्राधिक ग़ज़लों का पारायण करने के बाद उनके मध्य से १०० ऐसी ग़ज़लों का चुनाव किया गया है जिनका अनुवाद सम्भव हो सके तथा अनुवाद के बाद वे भारतीय जनमानस के लिए आस्वादन की दृष्टि से उपयुक्त हों। प्रस्तुत संग्रह को रूमी के एक लोकप्रिय संग्रह के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है तथा इसके प्रकाशन का लक्ष्य यह है कि पाठकों के लिए दुरूह हो कर भार न बन जाए। अतः ऐसी ग़ज़लों से जान बूझ कर बचा गया है जिनमें अरबी तथा ईरानी पृष्ठभूमि की अपरिचित पुराकथाओं अथवा गहन काव्यरूढियों का प्रयोग किया गया है। यद्यपि इसी तरह के वे शे,र जिनका काव्यात्मक मूल्य अधिक है, उन्हें सम्मिलित किया गया है।प्रस्तुत संकलन के ३ विभाग हैं। पहला बाबे तलब (साधन खण्ड), दूसरा बाबे तरब (विभूति खण्ड) तथा तीसरा बाबे विसाल (भरतवाक्य)।
प्रस्तुत अनुवाद दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में अध्यापक डा॰ बलराम शुक्ल द्वारा किया गया है। डा॰ शुक्ल संस्कृत के अतिरिक्त फ़ारसी भाषा में भी दक्ष हैं।इश्क़ो आतश नाम से इनकी फ़ारसी ग़ज़लों का एक संग्रह ईरान से भी प्रकाशित हो चुका है। इन्होंने फ़ारसी तथा भारतीय भाषाओं के पारस्परिक अन्तःसम्बन्ध पर अनेक विचारपूर्ण लेख लिखे हैं। इनके शोध का प्रमुख क्षेत्र भारतीय ज्ञान विज्ञान के फ़ारसीकरण से सम्बन्धित है।
प्रस्तुत संग्रह का स्वागत करते हुए उपर्युक्त पुस्तक से ७ ग़ज़लों को हम यहाँ उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं। सबसे पहले मूल फ़ारसी कविता गणनिदर्देश पूर्वक दी गई है फिर उसका हिन्दी अनुवाद –
१. हज्ज् ए अकबर[1]
मा,शूक़ हमीन् जा,स्त बियाईद बियाईद!!
दर बादिये सरगश्ते शुमा दर चे हवा–ईद?
हम ख़ाजे ओ हम ख़ाने ओ हम का,बे शुमा ईद
यक बार अज़् ईन् ख़ाने बर ईन बाम बर् आईद
अज़ ख़ाजे आन् ख़ाने निशानी बेनुमायीद
यक गौहरे जान् कू? अगर् अज़ बहरे ख़ुदा–ईद
अफ़सूस! कि बर गंजे शुमा पर्दे शुमा–ईद
१. अधमा तीर्थयात्रा च[2]
जिससे तुम्हें प्रेम है–तुम्हारा माशूक़! वह तो यहीं है, जल्दी से लौट आओ! लौट आओ!!
फिर तुम लोग और किसकीचाह में भटक रहे हो उस रेगिस्तान में?
जान जाते कि घर के मालिक, घर और का,बा सब तुम्हींतो हो! तुम्हीं तो हो!!
अब,सिर्फ़ एक बार इस (शरीर के) घर से निकलकर इस (हृदयकी) अटारी पर चढ़ आओ।
लेकिन कभी ऐसा भी तो हो, कि उस घर के स्वामी (ख़ुदा) की भी निशानियाँबयान करो!
अगर तुम सीधा ईश्वरीय सागर से ही होतो प्राण केतुच्छ मोती का तुम्हारे लिए क्या मूल्य?
लेकिन सबसे अफ़सोस की बात यह है कि इस अकूत ख़ज़ाने पर जो पर्दा पड़ा हुआ है, वह ख़ुद तुम ही हो।
२– बी मा[3]
आन् जा दिले मा गुशाद बी मा
रुख़ बर रुख़े मा निहाद बी मा
मा रा ग़मे ऊ बे ̆ज़ाद बी मा
मा ईम हमीशे शाद बी मा
मा ख़ुद हस्तीम यादे बी मा
ऐ मा कि हमीशे बाद बी मा
उस सफ़र पर हमारे दिल हमारे बिना ही खिल उठे थे।
उसने जब हमारे होंठों पर अपने होंठ रखे, तो हम ही वहाँ नहीं बचे!
उसकेग़म ने हमारे बग़ैर फिर से हमें पैदा किया।
हम हमेशा हमारे बग़ैर प्रसन्न हैं।
हम ख़ुदऐसी याद हैं जिसमें हम नहीं हैं।
ऐ काश! हम हमेशा हमारे बिना रह पाएँ।
बुग्शाय लब कि क़न्दे फ़रावान–म् आरज़ूस्त
का,न् चेह्रे ये मुशअशए ताबान–म् आरज़ूस्त
आन् गुफ़्तन–त कि बीश मरञ्जान–म् आरज़ूस्त
व्,आन् नाज़ बाज़ो तुन्दि ए दरबान–म् आरज़ूस्त
आवारगी ओ कूह् ओ बयाबान–म् आरज़ूस्त
शीर् ए ख़ुदा व रुस्तम् ए दस्तान–म् आरज़ूस्त
आन् नूर ए रू ए मूसी ए इमरान–म् आरज़ूस्त
आन् हायो हूयो ना,रे ए मस्तान–म् आरज़ूस्त
क,ज़ दीवो दद मलूल–म् ओ इन्सान–म् आरज़ूस्त
गुफ़्त् आन्कि याफ़्त मीनशवद आन–म् आरज़ूस्त
काने अक़ीक़ नादिरे अर्ज़ान–म् आरज़ूस्त
आन् आशकार–सुन्अते पिन्हान–म् आरज़ूस्त
रक़्सी चुनीन् मियाने ए मैदान–म् आरज़ू,स्त
वा,न् लुत्फ हा एज़ख़्मे ए रहमान–म् आरज़ूस्त
३– दिल चाहता है
१. मुझे बाग़ और गुलिस्तान देखने की चाहत है – मुझे अपना मुखड़ा दिखाओ।
मुझे चखने कोढेर सारी मिस्रीचाहिए– अपने लबों को खोल दो।
२. ऐ सुन्दरता के सूरज, एक पल के लिये बादलों से बाहर आ जाओ।
मुझे उस चमकदार पुरनूर चेहरे को देखना है।
३. तुमने कहा था–“मुझे ज़्यादा परेशान मत करो, यहाँ से जाओ”!
(मैंने कहा–)तुम्हारा यह कहना कि–“मुझे अधिक परेशान मत करो”–मुझे यही चाहिए।
४. (मुझे) भगाने के लिए दी गयी वह झिड़की कि– “जाओ मालिक घर पर नहीं हैं”….
तुम्हारे दरबान का वह नाज़ और उसकी वह तेज़ी मुझे फिर सहने का मन है
पहाड़ों और बयाबान की आवारगी करने का मन है मुझे।
मुझे ख़ुदा के शेर– अली और महायोद्धा रुस्तम जैसे लोगों की इच्छा है।
इमरान के पुत्र मूसा का नूरानी चेहरा देखने की इच्छा है मुझे।
मस्तों की तरह चहकने वाले लोगों के आहो पुकार की ख़ाहिश है मुझे।
“मैं अपने सब तरफ़ फैले पशुओं और राक्षसों से दुखी हो चुका हूँ। मुझे मनुष्य की खोज है”
उसने जवाब दिया–“जो चीज़ मिल नहीं सकती, उसी की तलाश है मुझे”।
मुझे उस अक़ीक़ के खान से ही तृप्ति मिलेगी, जो दुर्लभ तो है लेकिन मिलताबिना किसी मोल के है।
वह, जोख़ुद तो छिपा हुआ है लेकिन जिसकी सृष्टि प्रकट है , मुझे उसी की इच्छा है
इसीहाल में मैं खुले मैदान में नृत्य करना चाहता हूँ
मुझे ख़ुद पर दयालु परमेश्वर के मिज़राब के चोटों की आरज़ू है।
४– बी तू बसर न मीशवद[7]
१. बी हमगान् बसर शवद, बी तू बसर न मीशवद
दाग़े तो दारद ईन् दिल–म् जा ए दिगर न मीशवद
२. दीदे ए अक़्ल मस्ते तू, चर्ख़े ए चर्ख़ पस्ते तू
गूशे तरब बे दस्ते तू, बी तू बसर न मीशवद
३. जान् ज़े तू जूश मी कुनद, दिल ज़े तू नूश मी कुनद
अक़्ल ख़ुरूश मी कुनद, बी तू बसर न मीशवद
४. ख़म्रे मन् ओ ख़ुमारे मन, बाग़े मन् ओ बहारे मन
ख़ाबे मन् ओ क़रारे मन, बी तू बसर न मीशवद
५. जाह् ओ जलाले मन तू–ई, मिल्कत् ओ माले मन तू–ई
आबे ज़ुलाले मन तू–ई, बी तू बसर न मीशवद
६. गाह सू ए वफ़ा रवी गाह सू ए जफ़ा रवी
आने मनी कुजा रवी, बी तू बसर न मीशवद
ईन् हमे ख़ुद तू मी कुनी, बी तू बसर न मीशवद
बाग़े इरम सक़र शुदी, बी तू बसर न मीशवद
व,र बेरवी अदम शवम्, बी तू बसर न मीशवद
१०.बी तू न ज़िन्दगी ख़ुशम, बी तू न मुर्दगी ख़ुशम
सर ज़े ग़मे तू चून् बरम, बी तू बसर न मीशवद
११. हर चे बेगूयम ऐ सनद, नीस्त जुदा ज़े नीको बद
हम तू बेगू बे लुत्फ़े ख़्वद, बी तू बसर न मीशवद
४–येन जातानि जीवन्ति[8]
१. बाक़ी सभी लोगों के बिना गुज़ारा हो सकता है, बस एक तुम्हारे बिना हमारा गुज़ारा नहीं हो सकता।
इस दिल पर तुम्हारी मुहर लग चुकी है। यह और किसी दूसरी जगह जा ही नहीं सकता।
२. मेरी अक़्ल की आँखें तुमसे मस्त हो चुकी हैं, आसमान का चक्र तुम्हारे सामने झुक चुका है।
उत्सव का कान तुम्हारे हाथ में है, तुम्हारे बिना गुज़ारा नहीं हो सकता।
३. जब तुम नहीं होते हो तो मेरे प्राण उबलने लगते हैं। तुम्हारे साथ रहने पर मेरा दिल उत्सवमग्न हो जाता है।
और बुद्धि चिल्लाती रह जाती है, बताओ तुम्हारे बिना गुज़ारा कैसे हो सके।
४.मेरे शराब भी तुम हो और नशा भी तुम्हीं, मेरे बाग़ भी तुम्हीं हो और उस बाग़ की बहार भी तुम।
मेरी नींद भी तुम्ही हो और क़रार भी तुम। तुम्हारे बिना गुज़ारा नहीं हो सकता।
५. मेरी प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य तुम्हीं हो, मेरा स्वामित्व और सम्पदा तुम्हीं हो।
मेरे लिए पारदर्शी जीवनदायी जल की तरह हो तुम, तुम्हारे बिना गुज़ारा नहीं हो सकता।
६. कभी तो तुम वफ़ा करते हो तो कभी जफ़ा (अत्याचार) पर उतर आते हो।
तुम मेरा हिस्सा हो, तुम यह कैसा व्यवहार कर रहे हो, तुम्हारे बिना गुज़ारा कैसे हो सकता है।
७.जब आशिक़ तुम्हें दिल देते हैं तो तुम उसे लेते नहीं और जब तुमसे तोबा किया जाता है तो तुम उस तोबे को
तोड़ देते हो।
ये सारी विरोधी चीज़ें तुम ख़ुद करते हो, बताओ तुम्हारे बिना कैसे जिया जाये।
८.तुम्हारे बिना अगर जीना पड़ जाये तो सारी दुनिया उलट–पलट हो जाये,
स्वर्ग की वाटिका नरक–निधान हो जाये, क्योंकि तुम्हारे बिना बसर नहीं हो सकता।
९.अगर तू सर है तो मैं क़दम हूँ, अगर तू हथेली है तो मैं जीत का झण्डा हूँ।
अगर तू कहीं चला गया तो मैं नष्ट हो जाऊँगा क्योंकि तुम्हारे बिना जीना नहीं हो सकता।
१०.तुम्हारे बिना न तो मैं जीते जी ख़ुश हूँ और न ही मरने पर राज़ी।
बताओ तुम्हारी मुहब्बत से मैं दिल को कैसे हटाऊँ जबकि तुम्हारे बिना किसी तरह भी गुज़ारा नहीं हो सकता!
११. हे परम प्रमाण, जो भी मैंने कहा है वह नेक और बद से ख़ाली नहीं है!
काश, तू भी कृपावश कह उठे-“तुम्हारे बिना गुज़ारा नहीं हो सकता!”
५– बी तू बसर न मीशवद[9]
१. बी हमगान् बसर शवद, बी तू बसर न मीशवद
दाग़े तो दारद ईन् दिल–म् जा ए दिगर न मीशवद
२. दीदे ए अक़्ल मस्ते तू, चर्ख़े ए चर्ख़ पस्ते तू
गूशे तरब बे दस्ते तू, बी तू बसर न मीशवद
३. जान् ज़े तू जूश मी कुनद, दिल ज़े तू नूश मी कुनद
अक़्ल ख़ुरूश मी कुनद, बी तू बसर न मीशवद
४. ख़म्रे मन् ओ ख़ुमारे मन, बाग़े मन् ओ बहारे मन
ख़ाबे मन् ओ क़रारे मन, बी तू बसर न मीशवद
५. जाह् ओ जलाले मन तू–ई, मिल्कत् ओ माले मन तू–ई
आबे ज़ुलाले मन तू–ई, बी तू बसर न मीशवद
६. गाह सू ए वफ़ा रवी गाह सू ए जफ़ा रवी
आने मनी कुजा रवी, बी तू बसर न मीशवद
ईन् हमे ख़ुद तू मी कुनी, बी तू बसर न मीशवद
बाग़े इरम सक़र शुदी, बी तू बसर न मीशवद
व,र बेरवी अदम शवम्, बी तू बसर न मीशवद
१०.बी तू न ज़िन्दगी ख़ुशम, बी तू न मुर्दगी ख़ुशम
सर ज़े ग़मे तू चून् बरम, बी तू बसर न मीशवद
११. हर चे बेगूयम ऐ सनद, नीस्त जुदा ज़े नीको बद
हम तू बेगू बे लुत्फ़े ख़्वद, बी तू बसर न मीशवद
५–येन जातानि जीवन्ति[10]
१. बाक़ी सभी लोगों के बिना गुज़ारा हो सकता है, बस एक तुम्हारे बिना हमारा गुज़ारा नहीं हो सकता।
इस दिल पर तुम्हारी मुहर लग चुकी है। यह और किसी दूसरी जगह जा ही नहीं सकता।
२. मेरी अक़्ल की आँखें तुमसे मस्त हो चुकी हैं, आसमान का चक्र तुम्हारे सामने झुक चुका है।
उत्सव का कान तुम्हारे हाथ में है, तुम्हारे बिना गुज़ारा नहीं हो सकता।
३. जब तुम नहीं होते हो तो मेरे प्राण उबलने लगते हैं। तुम्हारे साथ रहने पर मेरा दिल उत्सवमग्न हो जाता है।
और बुद्धि चिल्लाती रह जाती है, बताओ तुम्हारे बिना गुज़ारा कैसे हो सके।
४.मेरे शराब भी तुम हो और नशा भी तुम्हीं, मेरे बाग़ भी तुम्हीं हो और उस बाग़ की बहार भी तुम।
मेरी नींद भी तुम्ही हो और क़रार भी तुम। तुम्हारे बिना गुज़ारा नहीं हो सकता।
५. मेरी प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य तुम्हीं हो, मेरा स्वामित्व और सम्पदा तुम्हीं हो।
मेरे लिए पारदर्शी जीवनदायी जल की तरह हो तुम, तुम्हारे बिना गुज़ारा नहीं हो सकता।
६. कभी तो तुम वफ़ा करते हो तो कभी जफ़ा (अत्याचार) पर उतर आते हो।
तुम मेरा हिस्सा हो, तुम यह कैसा व्यवहार कर रहे हो, तुम्हारे बिना गुज़ारा कैसे हो सकता है।
७.जब आशिक़ तुम्हें दिल देते हैं तो तुम उसे लेते नहीं और जब तुमसे तोबा किया जाता है तो तुम उस तोबे को
तोड़ देते हो।
ये सारी विरोधी चीज़ें तुम ख़ुद करते हो, बताओ तुम्हारे बिना कैसे जिया जाये।
८.तुम्हारे बिना अगर जीना पड़ जाये तो सारी दुनिया उलट–पलट हो जाये,
स्वर्ग की वाटिका नरक–निधान हो जाये, क्योंकि तुम्हारे बिना बसर नहीं हो सकता।
९.अगर तू सर है तो मैं क़दम हूँ, अगर तू हथेली है तो मैं जीत का झण्डा हूँ।
अगर तू कहीं चला गया तो मैं नष्ट हो जाऊँगा क्योंकि तुम्हारे बिना जीना नहीं हो सकता।
१०.तुम्हारे बिना न तो मैं जीते जी ख़ुश हूँ और न ही मरने पर राज़ी।
बताओ तुम्हारी मुहब्बत से मैं दिल को कैसे हटाऊँ जबकि तुम्हारे बिना किसी तरह भी गुज़ारा नहीं हो सकता!
११. हे परम प्रमाण, जो भी मैंने कहा है वह नेक और बद से ख़ाली नहीं है!
काश, तू भी कृपावश कह उठे-“तुम्हारे बिना गुज़ारा नहीं हो सकता!”
६– चे कुनद[11]
अलम् अज़ मुश्क न बन्दद चे कुनद?
चून् कि दर पूस्त न गुंजद, चे कुनद?
चे नुमायद, चे पसन्दद, चे कुनद?
पस दर् ईन् नादिरे गुम्बद चे कुनद?
न कुनद सज्दे, नख़न्दद, चे कुनद?
पैरहन रा न दरानद, चे कुनद?
न शवद ज़िन्दे, न ख़न्दद, चे कुनद?
न ख़ुरूशद, न तरंगद्, चे कुनद?
६– स्वभाव एवैष[12]
चतुर्दिक् अपने सुगन्ध की पताका न फहराए, तो और क्या करे?
–जब वह अपने खोल में न समा पाये, तो इसके अलावा क्या करे?
–क्या दिखाए, क्या पसन्द करे, और क्या करे?
–तो इस लम्बे चौड़े आसमान पर और क्या करे?
–तो वह उसे साष्टांग दण्डवत् न करे तो और क्या करे?
–अपने कपड़े न फ़ाड़ने लगे, तो क्या करे?
–वह ज़िन्दा होकर हँसने न लग जाए तो और क्या करे?
अब यह शोर न करे, आवाज़ न करे, तो और क्या करे?
७–इश्क़ जुम्ले सूद बाद[13]
१. ऐ ख़ुदा! अज़ आशिक़ान् ख़ुशनूद बाद
आशिक़ान् रा आक़िबत महमूद बाद
२. आशिक़ान् रा अज़ जमाल–त ईद बाद
जाने–शान् दर आतिश–त चून् ऊद बाद
३. हर के गूयद कि– “ख़लास–श देह ज़ इश्क़”
आन् दुआ अज़ आसमान् मरदूद बाद
४. मह कम् आयद मुद्दती दर राहे इश्क़
आन् कमी ए इश्क़ जुम्ले सूद बाद
५. दीगरान् अज़ मर्ग मुह्लत ख़ास्तन्द
आशिक़ान् गूयन्द–नै नै ज़ूद बाद
६. आसमान अज़ दूदे आशिक़ साख़्ते–स्त
आफ़रीन् बर साहिबे ईन् दूद बा
७–प्रेमियों के लिए दुआ
१. हे प्रभु आपप्रेम करने वालों से हमेशा ख़ुश–प्रसन्न रहें!
प्रेमियों का अन्त हमेशा भला और प्रशंसित हो।
२. तुम्हारे सौन्दर्य को देखदेख करआशिक़ों की ईद होती रहे।
तुम्हारीआग में उनके प्राण अगर की तरह सुलगते रहें।
३.यदि कोई दयावश उनके लिए प्रार्थना करे कि इनको प्रेम के कष्टों से मुक्ति मिल जाए–
–तो वह दुआ आसमान से टकराकर नीचे लौट आए। स्वीकार ही न हो।
४. प्रेम के रास्ते में चाँद कुछ मुद्दत के लिए घट भी जाता है।
प्रेम के मार्ग का वह सारा घाटा उसके लिए मुनाफ़ा हो जाए।
५.दूसरे लोग मौत से थोड़ी मुहलत माँगते हैं।
प्रेमी लोग कहते हैं– नहीं नहीं, मृत्यु बाद में क्यों, अभी आ जाए।
६. आसमान, प्रेमियों के आहों से निकलने वाले धुँए से बना हैं।
जिनके धुँए से यह आसमान बना है उनको शाबाशी
हो।
[1]छन्द ४– ऽ ऽ । । ऽ ऽ । । ऽ ऽ । । ऽ ऽ
[2]तीर्थयात्रा धर्म का सबसे प्रारम्भिक साधन है।
[3]छन्द ६ – ऽ ऽ । । ऽ । ऽ । ऽ ऽ
[4]कबीरदास
[5]छन्द १५ – ऽ ऽ । ऽ । ऽ । । ऽ ऽ । ऽ । ऽ
[6]मिस्र का एक अत्याचारी बादशाह जिसे पैग़म्बर मूसा ने हरा दिया था।
[7]छन्द १७ – ऽ । । ऽ । ऽ । ऽ ऽ । । ऽ । ऽ । ऽ
[8]तैत्तिरीय उपनिषद् ३.१.१ (सारे प्राणी जिसके नाते जीते हैं)
[9]छन्द १७ – ऽ । । ऽ । ऽ । ऽ ऽ । । ऽ । ऽ । ऽ
[10]तैत्तिरीय उपनिषद् ३.१.१ (सारे प्राणी जिसके नाते जीते हैं)
[11]छन्द १३ – ।।ऽऽ ।।ऽऽ ।।ऽ
[12]यह तो स्वाभाविक ही है।
[13]छन्द १२– ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ

अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्वं यदक्षरं
विवर्तते Sर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यत:
-भर्तृहरि(वाक्यपदीय)
(आदि और अंत से रहित जो अविनाशी ब्रह्म है , उसका स्वरूप शब्द है.
वही जागतिक पदार्थों के रूप में अपने आप को
परिवर्तित कर लेता है जिसके नाते संसार की प्रक्रिया चल पाती है)
शब्द नित्य है !. शब्द परब्रह्म है!!. समस्त सृष्टि ध्वनि की ही अभिव्यक्ति है!!! अतः यह स्वाभाविक है कि भारत की अनेक परम्पराओं में ध्वनि से स्वयं तथा सृष्टि को साधने का निर्देश दिया जाता रहा. सचमुच ‘शब्द’ हमारे अस्तित्व के रग-रग में परिव्याप्त है और भारत के आध्यात्मिक धरातल पर पवित्रता और आस्था के साथ शब्द प्रतिष्ठित है. प्राचीन काल से ही भारतीय जीवन में मंत्रों की महिमा बनी हुई है. सर्वविदित है कि संगीत की दुनिया में शब्द और श्वास को नियमित करना ही साधक के लिए श्रेयस्कर होता है. शब्द-ब्रह्म की साधना ‘मोक्षदायिनी’ कही गई है. प्रणव की ध्वनि ‘ऊं‘ (ओम) पर ध्यान केंद्रित करने का विधान है. शरीर में स्थित मूलाधार चक्र से क्रमश: आज्ञा चक्र और सहस्रार तक तक को चैतन्य की स्थिति लाने में अंदर की ‘अनहत’ ध्वनि के विविध रूपों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है. भाषा-प्रयोग में ध्वनि अर्थवान हो कर ‘वर्ण’ हो जाती है नहीं तो सिर्फ आवाज ही रहती है. शब्द या वाणी की अनुपम उपलब्धि है संगीत. इसका शाब्दिक अर्थ है ‘गान के सहित’. इसमें यही अर्थ निहित है कि वादन और नृत्य आदि के साथ किया गया गान. सामान्य व्यवहार में गाना, बजाना और नाचना प्राय: साथ-साथ होते हैं या उनका समन्वय होता है. हाथ में डमरू लिए नृत्य की मुद्रा में एक पैर उठाए भगवान शिव का नटराज रूप संगीत के समग्र भाव को मूर्त रूप में परिकल्पित करता है और इसलिए यदि वे संगीत के मूल के रूप में भी स्वीकृत हैं तो यह स्वाभाविक ही कहा जायगा. गीत , वाद्य और नृत्य इन तीनों में बजाना तो बाद की उपलब्धि है परंतु गाना और नाचना आनंदातिरेक की सहज अभिव्यक्ति के रूप में नैसर्गिक जैसे लगते हैं और धरती पर मनुष्य जीवन के आरम्भ से ही साथ-साथ चल रहे हैं.
संगीत में यहां पर गायन पक्ष पर विशेष चर्चा अभीष्ट है जो स्वयं में एक योग है. शारीरिक या दैहिक रूप से देखें तो गायन कार्य एक जटिल और अभ्यास की अपेक्षा करने वाली योग-क्रिया है. इसमें नाभिकेंद्र, वक्ष और कंठ के तनाव और खिंचाव के साथ ब्रह्म रंध्र तक पहुंचना होता है और पुन: नाभिकेंद्र तक वापसी होती है. इस प्रकार एक गति-चक्र बनता है जो निश्चय ही प्रमुख आभ्यंतर अंगों का समुचित व्यायाम का अवसर प्रदान करता जाता है. इन्हीं से सुर ,लय और ताल के साथ जो रचना होती है उसका माधुर्य श्रोता को भाव-विभोर कर देता है. स्मरणीय है कि गायन की क्रिया काफी जटिल होती है. इस क्रिया में बोलना और स्वर को हवा के माध्यम में विशेष रूप से लहराना निश्चय ही बाद की शास्त्रीय अध्ययन और चिंतन की उपलब्धि है परंतु भारत में इसकी बड़ी प्राचीन परम्परा है. साम गान और वेद के विभिन्न पाठ ( यथा-जटा पाठ, घन पाठ ) की परम्परा काफी पुरानी है.
आज संगीत ललित कलाओं की एक प्रमुख शाखा है. परम्परा के अनुसार संगीत का ज्ञान सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा ने सरस्वती को दिया, सरस्वती ने महर्षि नारद को दिया और नारद ने भरत मुनि को जिन्होंने ‘नाट्य शास्त्र’ की रचना की जिसमें संगीत पर भी विशद शास्त्रीय चर्चा की. यहां संगीत की लोकप्रियता के बारे में एक बात और भी कहनी आवश्यक है जिसका सम्बंध हमारी स्मृति से है. हम सबका अनुभव बताता है कि संगीतबद्ध रचना लय, सुर आदि गुणों के कारण अविस्मरणीय हो जाती है. इसीलिए किसी संदेश को सुरक्षित रखने के लिए संगीत एक आदर्श माध्यम के रूप में उपयोगी सिद्ध हुआ है. लेखन प्रथा शुरू होने के पहले वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत ,ओल्ड टेस्टामेंट, इलीयड, ओडिसी जैसी रचनाएं देश विदेश में काल की सीमाओं का अतिक्रमण कर सदियो-सदियों तक वाचिक परम्परा में ही जीवित रहीं. आज ज्ञान विज्ञान की सारी उपलब्धियां श्ब्द से ही संभव हो रही है . सत्य ही कहा गया है : सर्वं शब्देन भासते !
भारतीय परंपरा में साहित्य, संगीत और कला के तत्वों को मनुष्य को पशु से अलग करने वाला कहा गया है : साहित्यसंगीतकलाविहीन: साक्षात्पशु: पुच्छपिषाणहीन: . यह बात बहुत हद तक सही है. यद्यपि इसके कुछ अपवाद भी मिलते हैं जहां पशु भी संगीत के प्रति रुझान दिखाते हैं और कुछ मनुष्य भी संगीत-रहित हो सकते हैं यदि उनके मस्तिष्क की संरचना (मुख्यत: बेसल गैंग्लिया) को किसी तरह का आघात पहुंचा हुआ हो. संगीत में रुचि मानव सभ्यता में प्राचीन काल से ही प्रप्त होती है. जर्मनी में पुरातात्विक अवशेष के रूप में प्राप्त हड्डियों की बांसुरी अनुमानत: चालीस हजार साल पुरानी है. मध्य प्रदेश में भोपाल के पास भीम बैठका में प्रागैतिहासिक काल के भित्ति चित्र मिले हैं जो वाद्य यंत्रों और नृत्य मुद्राओं को दर्शाते हैं. चीन में हेनान प्रांत में जियाहू नामक स्थान पर 7 से 9 हजार साल पुरनी बांसुरी मिली है. सभी संस्कृतियों में संगीत मिलता है. संगीत का संस्कृति के लिए सर्जनात्मक अवदान असंदिग्ध है. वस्तुत: मनुष्य वाणी को संस्कार देता है जिसका उत्कृष्ट रूप संगीत में परिलक्षित होता है . शिव और सरस्वती को संगीत के आदि स्रोत की मान्यता है. वह अंतत: रस की ही साधना है. संगीत के सौंदर्य से मन आनंद से द्रवित होने लगता है. कहते हैं कृष्ण की बांसुरी से पशु पक्षी सभी खिचे चले आते थे. हमारे मस्तिष्क के न्यूरोन संगीत की बीट पर लयबद्ध होते हैं और डोपामाइन नामक रसायन का श्राव करते हैं जिससे सुखद संगीत सुनना सबको प्रीतिकर लगता है.
संगीत भी बहुत कुछ हमारी भाषा की तरह ही है. वस्तुतः वह विश्व की सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय भाषा है जो सहज में ही सबकी समझ में सरलता से आ जाती है. दोनों में अर्थ की ही प्रधानता होती है. वे सूचना देते हैं और अपने संबोध्य से कुछ कहते हैं. आज विश्व में संगीत के अनेकानेक रूप मिलते हैं. भारतीय परम्परा सामवेद को संगीत की आरम्भिक या प्रथम रचना मानते हैं. वेद पाठ के लिए उदात्त , अनुदात्त और स्वरित के चिह्न हैं परन्तु सामवेद के गान के लिए एक पूरी स्वर लिपि विकसित की गई थी जो कदाचित विश्व की प्राचीनतम स्वर लिपि है. सामवेद के सारे मंत्र आज भी उसी रूप में गेय हैं. वैदिक काल में संगीत के मार्गी और देशी दो रूप थे. कालान्तर में मार्गी को शास्त्रीय संगीत (हिंदुस्तानी, कर्नाटक) और शेष को लोक संगीत का नाम मिला. इसे सुगम या भाव संगीत भी कहते हैं. आज भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अन्यान्य परम्पराएं और रबींद्र संगीत के साथ पश्चिमी राक, पाप, जाज आदि की संगीत परम्पराएं प्रचलित हैं. इनके अतिरिक्त लोकप्रिय फिल्मी संगीत भी है जिसमें अनेक कला-रूपों का मिश्रण होता है. आज गीत, वाद्य और नृत्य की त्रयी हमारे जीवनानुभव में कुछ इस तरह रच बस गई है या कहें गहरे भिनी हुई है कि हम उन्हें सामान्यतया कोई विशेष महत्व नहीं देते. हां , काल के आयाम पर ध्वनि की सुर ताल की खास व्यवस्था किसी को भी थिरकने के लिए यानी अपने शरीर की गति के लिए बाध्य कर देती है. संगीत सुन कर बिना तकनीकी ज्ञान के ही लोग झूम पड़ते हैं.
भारतीय संगीत में सात स्वर हैं : षड्ज (सा), ऋषभ (रे) , गंधार (ग) , मध्यम (म), पंचम (प), धैवत (ध) , तथा निषाद (नी) . शुद्ध स्वर से उपर या नीचे विकृत स्वर आते है. सा और प के कोई विकृत स्वर नही होते. रे, ग, ध और नी के विकृत स्वर नीचे होते है और उन्हे कोमल’ कहा जाता है. म का विकृत स्वर उपर होता है और उसे तीव्र कहा जाता है. सात शुद्ध स्वरों के समूह को सप्तक कहते हैं. समकालीन भारतीय शास्त्रीय संगीत में ज्यादातर यह बारह स्वर इस्तमाल किये जाते है. स्वर सप्तक है बड़े चर्चित हैं. महर्षि भरत ने इसी के आधार पर २२ श्रुतियों का प्रतिपादन किया था जो केवल भारतीय शास्त्रीय संगीत की ही विशेषता है. जब कोई ध्वनि आवर्त कम्पनों या नियमित आंदोलन वाली से मिल कर उत्पन्न होती है तो उसे स्वर या नाद कहते हैं. यही कर्णप्रिय और मधुर होती है और संगीत का आधार है. इनकी संख्या 22 है. ध्वनि की आरम्भिक स्थिति श्रुति और उसका अनुरणनात्मक (गुंजित) रूप स्वर कहलाता है. कम से कम पांच और अधिक से अधिक सात स्वरों की मधुर रचना राग कहलाती है.
वैसे तो मनुष्य के मस्तिष्क में संगीत को पैदा करने की संरचना जन्म से ही विद्यमान होती है परंतु उसका विकास प्रशिक्षण पर ही निर्भर करता है. संगीत के प्रति संवेदनशील दैहिक रचनाएं पूरे मस्तिष्क में फैली होती हैं. अध्ययनों से पता चलता है कि गर्भावस्था में 20-25 सप्ताह की आयु में ही ध्वनि के प्रति संवेदना शुरू होती है जो 28 सप्ताह में स्थिर और 30 वें से आवृत्ति (फ्रिक्वेंसी)भेद के प्रति संवेदना दिखाने लगते है. जन्म के पश्चात 12-36 महीने की आयु में ध्वनि संवेदना 3-5 वर्ष की आयु होते-होते में अर्थ और अभिव्यक्ति का विकास होता है. स्कूल जाते समय बच्चे अच्छी तरह गाने और लय दुहराने लगते हैं पर प्राय: विद्यालयों में इसे मह्त्व ही नहीं मिलता है. पाया गया है कि संगीत-शिक्षा से मस्तिष्क के अंदर का ‘ग्रे मैटर’ गाढा हो जाता है. पियानो वादकों के सेरेबेलम बड़े आकार का हो जाता है. कार्पस कैलोसम जो मस्तिष्क के दो गोलार्धों को जोड़ने का कार्य करता है, गाढा हो जाता है. हिप्पोकम्पस और अमिग्डाला नामक मस्तिष्क संरचनाएं भी संगीत से प्रभावित होती हैं. वस्तुत: हमारा पूरा मस्तिष्क संगीत से प्रभावित होता है. कुछ ध्वनियां जैसे बच्चों को सुलाने वाली लोरी, अपरिपक्व आयु में जन्मे बच्चों के सोने-खाने के क्रम और तनाव को कम करती है. इस तरह का संगीत बच्चों को सचेत रखता है. नींद भी अच्छी आती है. संगीत में कुछ खास बात है जो शरीर को उत्तेजित और सक्रिय कर देती है.
संगीत हमारे संवेगों की अभिव्यक्ति का एक प्रभावी माध्यम है यह तो पुरानी बात है. साम वेद और भरत मुनि के ‘नाट्य शास्त्र’ में विस्तार में इसका विवेचन मिलता है. शारीरिक रोगों के उपचार में संगीत का लाभ आधुनिक अध्ययनों से मिलने वाली नई जानकारी है जिसकी ओर यहां ध्यान आकृष्ट किया जायगा. इससे पता चलता है कि संगीत शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र की सुरक्षा और तनाव को दूर करने में सहायक है. संगीत के साथ सम्पर्क होने से शरीर में इमूनोग्लोबुलिन-ए तथा प्राकृतिक किलर सेल पैदा होते हैं जो बाह्य आक्रमणकारी वाइरस से लड़ते हैं. संगीत तनाव पैदा करने वाले कर्टिसोल नामक हार्मोन के उत्पादन को भी कम करता है जिससे मन को विश्रांति मिलती है. संगीत की मधुर ध्वनि हो तो रोगी को सूई चुभने (इंजेक्शन)की पीड़ा भी कम हो जाती है. वस्तुत: हमारा मस्तिष्क संगीत के प्रति खास तरह से प्रतिक्रिया करता है और बच्चे और बड़े दोनों ही तरह के रोगी संगीत के उपचार से लाभान्वित होते हैं. कई अध्ययनों में कम्पन या वाइब्रेशन का सकारात्मक परिणाम पाया गया है. ध्वनिकम्पी (वाइब्रोएकाउस्टिक) उपचार में कम आवृत्ति की ध्वनि का उपयोग किया जाता है. बिस्तर या कुर्सी में लगे स्पीकर रोगी को कम्पन भेजते हैं जो सुने और मह्सूस किए जा सकते हैं. पार्किंसन के रोगियों को भी लाभ मिला है. संगीत की स्वर-लहरी गलत दिशा में उन्मुखता ( डिसओरीयेंटेशन) की स्थिति को ठीक करती है. संगीत को दर्द, अवसाद और अल्जाइमर जैसे रोगों की चिकित्सा में सहायक पाया गया है. इससे रोगी की जीवन की गुणवत्ता में सुधार और दर्द के अपशमन में आसानी होती है. मस्तिष्क के क्षेत्रों में सामान्य संचार होने से स्मृति की पुन:प्राप्ति सरल हो जाती है.
शांति हो तभी सुख भी है , अशांत चित्त वाले को सुख नहीं मिलता : अशांतस्य कुत: सुखं ? जीवन की आपाधापी में आज तनाव, चिंता और दबाव जैसी स्थितियां हर व्यक्ति के जीवन में पैदा हो रही हैं. इन स्थितियों में व्यक्ति निरुत्साहित और स्फूर्तिहीन अनुभव करने लगता है. उसमें कई तरह के नकारात्मक भाव भी पैदा होने लगते हैं जो अस्वास्थ्यकर होते हैं. इनके लिए विभिन्न वाद्य यंत्रों की सहायता से मधुर संगीत मस्तिष्क में कम्पन के द्वारा शांति प्रदान करता है. ऐसे ही नाद योग के अंतर्गत लय बद्ध श्वांस लेने की एक निश्चित आवृत्ति वाद्य यंत्र से उत्पन्न की जाती है जिसके उपयोग से शरीर में स्थित सात चक्रों को लाभ मिलता है. वैसे संगीत सुनने से बच्चों बड़ों सबका मन प्रसन्न हो जाता है और हर्ष की अनुभूति होती है.
संगीत के रागों का पंच महाभूतों – पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल और आकाश – से गहरा रिश्ता होता है. ध्वनि तरंग गति से ऊर्जा को सम्प्रेषित करती है और माध्यम को सक्रिय करती है. बाहर की ध्वनि और अंदर की ध्वनि से शरीर , भावनाएं और मन तीनों ही प्रभावित होते हैं. राग में प्रयुक्त स्वर का प्रभाव वात , पित्त तथा कफ पर पड़ता है और उससे रोग निवारण में मदद मिलती है. राग भैरवी कफ रोग , फ्लू तथा श्वास कष्ट में लाभकारी पाया गया है. मल्हार और जै जयवंती स्वास्थ, प्रसन्नता और आशा का संचार करते हैं. राग आसावरी रक्त और वीर्य के दोषों का शमन करता है. उससे मन शांत और क्रोध कम होता है. बागीश्वरी और गुर्जरी राग अस्थ्मा में हितकारी होते हैं. राग सारंग शिरो वेदना में और राग पलासी और मुल्तानी आंख के कष्ट में लाभकर होते हैं . राग दरबारी हृदय रोग के कष्ट निवारण में सहायक पाया गया है. अब संगीत केवल संस्कृति का ही तत्व ही नहीं है वरन चिकित्सा का भी अंश हो रहा है. अब जल्दी ही डाक्टर लोग रोगी के नुस्खे में उचित संगीत भी तज्बीज कर लिखा करेंगे.
संगीत से हमारे संवेगों की दुनिया का प्रभावी ढंग से नियमन होता है. संगीत सुनने से व्यक्ति का तनाव दूर होता है और संतुलन वापस आता है. मनपसंद संगीत सुनने से संवेग का विरेचन(कैथार्सिस) हो जाता है , व्यक्ति को सामर्थ्य और सक्षमता की अनुभूति होती है और वह अच्छे ‘मूड’ या मनोदशा महसूस करता है. अस्तित्व की सबसे बड़ी चुनौती मृत्यु का चेतन अचेतन भय है जो संगीत दूर भगाता है. संगीत में तन्मय होने से, जिसे संगीतमयता (म्यूजिकिंग) कहा जा रहा है, जिसमें संगीत सुनना, रचना और उसे गाना या प्रस्तुत करना तीनों ही सम्मिलित होते हैं, इस महा-भय को घटाती है . संगीत जीवन की चुनौतियों के समाधान उपस्थित करता है और तनाव तथा त्रासदी को कम करता है. सामाजिक बहिष्कार झेलते युवा आत्म विश्वास और पहचान प्राप्त करते हैं. संगीत से ‘इंडोर्फिन’ पैदा होता है फलत: लोग एकजुट हो कर काम करते हैं.
संगीत मनुष्य को पीड़ा की अनुभूति से ऊपर ले जाता है, उसका ध्यान केंद्रित करता है और विश्राम देता है. लियो टाल्स्ताय ने कहा था कि संगीत ‘संवेग का शार्ट हैंड’ है. जहां शब्द विचार को सोचने के लिए होते हैं, संगीत विचार की भावनात्मक अनुभूति कराता है. मनोदशा या मूड और मस्तिष्क ये दोनों ही संगीत से प्रभावित होते हैं. संगीत और संवेग का रिश्ता व्यक्ति की संलग्नता पर निर्भर करता है. व्यक्ति के लिए समय तब ठहर सा जाता है जब वह काम में डूबा रहता है और उसकी आत्मचेतना खोई रहती है. संगीत सुन कर प्रसन्नता की अनुभुति होती है विशेष रूप से किशोरों में आशा और खुशहाली आती है . संगीत दृष्टि देता है और परिष्कार करता है. मस्तिष्क की क्रिया और श्रोता मंडली की अनुभूति के बीच बहुत हद तक साम्य का भाव पाया जाता है . क्रोध या आचर्य की अनुभूति बताने वाले के मस्तिष्क में भी भिन्न संरूप था. अपनी पसंद के संगीत को सुनने पर मस्तिष्क में भिन्न उद्दीपन चित्र बन रहे थे. संगीत मस्तिष्क में प्रतिक्रियाएं पैदा करता है और उसमें घाव भरने की क्षमता है. यह मस्तिष्क का पुनर्लेखन करता है. मन के अंधेरे कोनों में प्रकाश भर देता है. शरीर और भाव दोनों ही दृष्टियों से विह्वल कर प्रसन्नता और खुशी का संचार करता है.
संगीत सुनना अंत:सांस्कृतिक रिश्तों को जगाता है. एक भिन्न और नई संस्कृति के संगीत को सुन कर उसके प्रति मन में सकारात्मक विचार पैदा होते हैं. यह सामान्य अनुभव है कि संगीत और नृत्य आश्वस्ति भाव या खुशहाली की अनुभूति से बड़े करीब से जुड़े होते हैं. आज कल कई तरह की संगीत सभाएं होती हैं और सबका अलग प्रभाव पड़ता है. जब गायक स्वयं सामने बैठ साक्षात गाते हैं तो संगीत का अधिक प्रभाव पड़ता है. वह तनावमुक्त कर देता है, तब भी जब वह प्रोफेशनल न हो. संगीत व्यक्ति को कुछ समय के लिए उसके वर्तमान से बाहर विस्थापित कर देता है. अनेक संगीत समारोह धार्मिक समेत आयोजित होते हैं जिनमें समान दृष्टि वाले लोग एकत्र होते हैं. नए उद्दीपन से मस्तिष्क में डोपामाइन नि;सृत होते हैं और अग्रमस्तिष्क सक्रिय हो उठता है. हृदय के द्वार खोल देता है. संगीत समारोह में भाग लेने से सामाजिक तथा मानसिक स्वास्थ्य दोनों का लाभ मिलता है.संगीत की सामाजिक नेटवर्क की भी उल्लेखनीय भूमिका होती है. इस रूप में संगीत एक सामाजिक – सांस्कृतिक संसाधन का आकार ले लेता है. संगीत का सौंदर्य यह है कि वह सब लोगों को जोड़ता चलता है. उसमें संदेश होता है और संगीतज्ञ उसके वाहक. भारतीय संगीत अपनी मधुरता, लयबद्धता तथा विविधता के लिए विश्वप्रसिद्ध है. यद्यपि इसका आरम्भ धार्मिक प्रेरणा से हुआ पर शनै: शनै: यह धर्म की परिधि को लांघते हुए विस्तृत लौकिक जीवन से जुड़ता गया और इसी के साथ नृत्य, वाद्य तथा गीतों के नये-नये रूपों का आविष्कार होता गया. कालांतर में नाट्य भी संगीत का अंग हो गया. समय के साथ संगीत की विभिन्न धाराएँ विकसित होती गई, नये राग, नये वाद्य यंत्र प्रयोग में आने लगे. आज संगीत न केवल लोक-चित्त के रंजन का माध्यम है अपितु प्रतिस्पर्धा और संघर्ष के दौर में आरोग्य का सुगम और समर्थ माध्यम है .
Psychologus, 2019, 1 (7), 90-97 ( WWW.PSYCHOLOGUS.COM)

It was “Psychological Consequences of Prolonged Deprivation.”
During my academic career spanning over four decades a number of seniors and Gurus (teachers) had influenced my academic journey. I owe a lot to them. Due to space constraints it would be difficult to mention all of them. So I would selectively mention four of them who nurtured me in many ways. My first teacher in psychology was Professor H.S. Asthana who came to Gorakhpur University as a faculty for a short period. He took classes in BA first year and helped learning psychological principles in an inimitable simple style. He created interest in understanding psychological phenomena. He returned to Sagar University after two years but continued to bless me by his guidance throughout my career. Secondly, Professor L.B. Tripathi provided a role model during my subsequent academic career. He was a scholar par excellence, a great teacher and an exceptionally good human being. He had trust in me and inspired by his exemplary character, passion for learning and commitment. At home my elder brother Professor Vidya Niwas Misra offered a wide scope to learn about the nuances of language, literature and culture. He was a leading linguist, Sanskrit scholar and a Hindi essayist. My interest in cultural processes grew under his guidance and support. With him I developed a passion to learn and share. My interest in cultural and indigenous psychology was shaped by Professor Durganand Sinha at Allahabad University. As a mentor he created an incessant urge in me to learn and grow in academics. During my Senior Fulbright Fellowship I had opportunity to work with Professor Kenneth J. Gergen at Swarthmore College, Philadelphia. He is a pioneer social psychologist and thinker. He broadened my vision of psychology and methodology and helped to critically examine many important issues. All these Gurus have served as a source of inspiration for me.
In general, I enjoyed studies and did not face any serious problem. However, managing time and maintaining relationships with friends and family members to their satisfaction waschallenging. I had to take extra care and invest time and effort there. Since then,‘balancing’ and ‘adapting’ became key words in life.
I chose psychology as one of the three subjects at Bachelor’s level. It was a relatively new discipline and appeared to make promise for understanding the intricacies of personal and social lives. In particular the emotional lives of people drew my attention. They were present in media, literature as well as in everyday life.
One has to be reflective and maintain disciplined curiosity about mental and behavioral phenomena pertaining to self and others. Self-reflection is a must. Also, one should be open to ideas and should not hold fixed notions and prejudices against others. Ability to carefully observe and attending to the surrounding social and physical environment would be very helpful. A psychologist must respect other people and try to maintain their dignity. Others are not mere ‘subjects’. There is much to learn from other individuals. Finally, while understanding any phenomenon the immediate environment, broader ecology and culture need to be taken into account. They are the key forces determining the course of human action. It’s important because psychologists are usually in the habit of reducing everything to individual disposition or trait. They unnecessarily posit a construct supposedly describing some internal condition as the cause of behavior (or some other disposition!).
It’s a bit difficult and challenging to accurately understand one’s own self. I shall try to share a few things that come to my mind right now. Curiosity and commitment are central in articulating my style. I like to read literature and enjoy learning about new ideas. I love to work, help friends, students and colleagues. I cherish having passionate engagement with academics. I feel disturbed if others do not take their work seriously. I try to convince others and urge to be accountable and contribute to their field of work. Gradually I have started accepting others as they are. I try to figure out their strengths and help them grow. I try to learn from mistakes.
Analyzing the cultural roots of psychological processes in general as well as emotion and personality in particular appear fascinating. The indigenous ideas need to be explored in-depth. Psychology in the Western world is not divided between academic and non-academic/mundane categories as done in the Indian condition and have developed the habit of using Western concepts/theories to analyze Indian realities. We often fail to understand the relationship between cultural-societal conditions and production of knowledge. We treat all the Western theories as universal. Indian society also deserves to be understood in terms of indigenous categories and approaches, which is very difficult as the vast majority of our research efforts have been preoccupied with theory and methodology borrowed from the West.
In the Indian context people often share their time, energy and financial resources with other people provided that they see certain degree of genuineness in them. The sense of social obligation still occupies an important place in life. At the same time the contemporary problems emerging from consumerism, questions of morality in public life and upsurge of negative emotions need research attention. Self-regulation and wellbeing are also important concerns. We also need to appreciate the implications of social diversity realistically. Similarly, the impact of globalization needs to be understood and we need to explore how the Indian society should reposition itself in the emerging scenario.
For quite some time I have been engaged in editing the 6thICSSR Survey and Explorations in Psychology. It is being published by the Oxford University Press (2019) in 5 volumes. It provides a very comprehensive survey of theory and research in different areas. I also edited a volume entitled Psycho Social Interventions for Health and Wellbeing (Springer, 2018). Now I am editing a volume on ‘the history of psychology in modern India.’ It is a follow up of the centenary celebrations of the first psychology department at Calcutta University in 2015-16.
I have been worried that our undergraduate students are not exposed to Indian research. To this end I have tried to follow a middle path and adapted two volumes of general psychology and one on educational psychology. The texts so produced provide access to Indian studies and ideas also. These volumes are as follows:
In the last few years I have been engaged with two major research projects. First one is a large scale research program sponsored by ICSSR on shared spaces. Our team comprising of Purnima Singh, Roomana Siddiqui, Arvind K. Mishra and PreetiKapur and myself undertook a multi method and multi centric study with different samples from Delhi, Gujarat, Bihar, Karnataka and Uttar Pradesh. Similarly, I have completed another project on religion, identity and wellbeing with PreetiKapur. Both the reports are being finalized for publication. I also edited a volume with Ajit Dalal entitled Psychology for India (SAGE, 2016). It’s a volume comprising of selected papers of Professor D. Sinha.
During the last five years (from March 2014 to April 2019) I was entrusted with the task of academic administration and leadership as Vice Chancellor of Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi VishwavidyalayaWardha, a Central University in Maharashtra. This provided me an opportunity to work in the area of literature and language. I chose to write in Hindi national dailies like DainikJagaran, Amar Ujala, Rashtriya Sahara and DainikBhaskar and several Hindi journals on social, cultural and psychological themes. A set of four volumes of essays has been published. I also made efforts to create links between language, literature and social sciences through organizing interdisciplinary seminars. I also studied the thoughts Mahatma Gandhi. I also realized that literature needs to be studied not merely as a fiction but also as a source of psychological insights (visit https://youtu.be/76MSSVDwaSSy).
I am currently writing a piece on Indigenization of Psychology in the Indian Context. In recent years the social science research (SSR) in India has been criticized on account of the lack of creativity, low applicability and replication of Western findings. Further, the publication and dissemination primarily through English language, has made it inaccessible for a majority of the Indian people. A critical reflection regarding the disciplinary developments is required. I am examining the issues of globalization, increased intercultural communication, and socio-cultural diversity. I am proposing ways to develop a culturally informed psychology.
The usual practice of psychological research has been confined to the use of a single sample. The researchers, however, indulge in unwarranted generalizations. During my research career I have interacted and organized studies with people from different backgrounds e.g. regions, gender, age groups, ecological settings, and cultures. I have also participated in joint and collaborative studies at national and international levels. The socio-cultural variety in India provides an excellent opportunity for social psychological research. Expanding research to multiple sites and samples, however, demands conceptual and methodological innovations. We need to develop strategies for psychological mapping and to integrate multi-site studies and drawing conclusions. The groups varying in socio-demographic background and cultural practices pose problems related to communication also. To this end we need to build pool of researchers from different regions and involve them in projects on a long term basis.
Currently three large associations are active: National Academy of Psychology (NAOP), Indian Academy of Applied Psychology and Indian Association of Clinical Psychology. In addition, there are some regional and some discipline specific associations. The NAOP represents India at the International Union of Psychological Sciences. It is gratifying that India is elected as a member of the Executive Council of this international body. The national conventions of the NAOP have been attended by the Presidents and other representatives of American Psychological Association, International Association of Applied Psychology, International Congress of Psychology, and International Association of Cross Cultural Psychology. However, the participation of psychologists in the meetings of professional bodies is less than satisfactory. We need to strengthen our association by taking interest in their activities.
English language currently dominates the academic scenario in Indian higher education. This certainly provides an advantage for the Indian students in the era of globalization. The students are able to consult research literature published in English and publish their own work in English language journals. However, we miss the point that English is not the universal language spoken across the globe. Even in Europe itself there are other important languages (e.g. German, French and Russian). Also, in India the number of English speaking people is about 10 per cent. Hindi is spoken by more than 40 percent Indians. It is spoken in 11 states of India. It is used as medium of instruction at university level in most of these states. Perhaps the students have a choice and many universities run separate sections for Hindi and English medium students. The number of Hindi medium students is significantly increasing. They do need good textbooks, supply of research publications and avenues for research publications. The current situation is less than satisfactory. There is lack of quality books. Most of them are poor translations of old Western books. Also, the Hindi books are not updated. Concerted effort is required to fill the gap. I have been involved in preparing textbooks in 1970s and 1980s and contributed volumes on Experimental Psychology, Social Psychology and Research Methods. I also translated a couple of books. I am planning to focus on this issue once again. In fact at Wardha I gave a series of lectures on research methods. I would like to elaborate that enrich to prepare a book on qualitative methods.
I think this issue relates primarily with cultural grounding psychological science. It’s sad that modern psychology started with Wundt had a respectable place for culture. He wrote volumes on folk psychology. Its American avatar gave it a shape of experimental science. In the 1960s programmatic efforts in cross cultural psychology started. They were followed by cultural psychology, indigenous psychology movements in different countries. The move for indigenization also started (See Misra,G. &Gergen,K.J. 1993, On the place of culture in psychological science. International Journal of Psychology, 28, 225-243). In general the main framework of psychology remained as it was and some concessions were made for culture. This was not sufficient to acknowledge and integrate the resources available in the Indian thought systems. Some colleagues are calling it Indian Psychology (see Dalal, A.K. & Misra, G. (2010). The core and context of Indian psychology. Psychology and Developing Societies, 22, 121-135). K.R.Rao and A.C. Paranjpe (2016) have recently published a volume entitled Psychology in the Indian Tradition (New Delhi: Springer). There are many reasons for the neglect and avoidance of Indian thought. A detailed analysis is required to create a vision for culturally rooted psychology. In brief the following seem to be critical for the negligence of Indian thought.
The future course of psychology in India needs to attend some of the grand challenges before the nation. We need to adopt a problem orientation and make efforts to address these challenges. Some of them are as follows.